मध्ययुगीन भारत में जीवन पर निबंध | Essay on Life in Medieval India in Hindi. Here is an essay on ‘Medieval India’ for class 8, 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essays on ‘Medieval India’ especially written for school and college students in Hindi language.

Essay on Medieval India


Essay Contents:

  1. मध्यकालीन भारत में सामाजिक संकट और भूमि वितरण  (Social Crisis and Land Distribution in Medieval India)
  2. मध्यकालीन भारत में  भूस्वामियों का उदय (Rise of Landowners in Medieval India)
  3. मध्यकालीन भारत और नई कृषि अर्थव्यवस्था (New Agricultural Economy during Medieval India)
  4. मध्यकालीन भारत में व्यापार का ह्रास और प्राचीन नगरों का पतन (Degradation of Business and Collapse of Ancient Cities in Medieval India)
  5. मध्यकालीन भारत में क्षेत्रीय पहचान (Regional Identification during Medieval India)
  6. मध्यकालीन भारत में साहित्य (Literature during Medieval India)
  7. मध्यकालीन भारत में दैवी अनुक्रम (Divine Sequence during Medieval India)

Essay # 1. मध्यकालीन भारत में सामाजिक संकट और भूमि वितरण  (Social Crisis and Land Distribution in Medieval India):

प्राचीन भारतीय समाज जो धीरे-धीरे मध्यकालीन समाज में बदला उसका मूल कारण था भूमि अनुदान की प्रथा । यह प्रथा कैसे आरंभ हुई ? भूमि अनुदान के शासनपत्र (सनद) बताते हैं कि दाताओं मुख्यत: राजाओं को पुण्य-प्राप्ति की कामना रहती थी और दान पानेवालों मुख्यत: भिक्षुओं और पुरोहितों को धार्मिक अनुष्ठान चलाने की । लगता है कि इसी के कारण भूमि दान चला ।

परंतु वास्तव में यह प्रथा ऐसे गंभीर संकट के कारण चली जो प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के ऊपर मंडरा रहा था । वर्णमूलक समाज-व्यवस्था वैश्य कहलानेवाले किसानों और शूद्र कहलाने वाले मजदूरों के उत्पादनात्मक कार्यकलापों पर टिकी थी ।

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राजा के अधिकारी इन वैश्यों से जो कर वसूलते थे उससे वे अपने अधिकारियों और श्रमिकों का वेतन चुकाते थे पुरोहितों को दान-दक्षिणा देते थे और भोग-विलास की वस्तुएँ वणिकों और बड़े-बड़े शिल्पियों से खरीदते थे । लेकिन ईसा की तीसरी-चौथी सदियों में आकर पुराणों में वर्णित कलियुग नामक संकट ने इस व्यवस्था को ग्रसित कर लिया ।

समकालीन पुराणों ने ऐसी अवस्था का वर्णन किया है जब वर्ण अपने-अपने नियत कर्मों से विमुख होने लगे । निचले वर्ण उच्च वर्ण बनने और उनके कर्मों को अपनाने लगे । अर्थात् वे कर चुकाना और सेवा-कर्म छोड़ने लगे । इससे वर्णसंकर उत्पन्न हुआ अर्थात् एक वर्ण दूसरे वर्ण में मिलने लगा । वर्णभेद के बंधनों को तोड़ने का प्रयास होने लगा क्योंकि उत्पादक वर्ग तरह-तरह के करों और लगानों के बोझ से पीड़ित था और राजा उस वर्ग की रक्षा नहीं करता था ।

इस तरह की स्थिति को पुराणों में कलियुग बतलाया गया है और पुराणों के जिन भागों में इसका चित्रण किया गया है, उनका समय तीसरी-चौथी ई० में रखा गया है । इस संकट से निबटने के लिए अनेक उपाय किए गए । मनुस्मृति, जो लगभग इसी समय की है बताती है कि शूद्रों और वैश्यों को अपने-अपने कर्मों से विचलित नहीं होने देना चाहिए ।

इससे दमनात्मक कार्रवाई को प्रश्रय मिला होगा । लेकिन इस स्थिति से निपटने के लिए एक अधिक कारगर कदम था पुरोहितों और अधिकारियों को वेतन में पैसे या अनाज की जगह बड़े पैमाने पर भूमि का अनुदान । इसमें यह सुविधा थी कि इससे राज-प्रदत्त क्षेत्रों में करों की वसूली करने और शांति-व्यवस्था बनाए रखने का भार अनुदानभोगियों के ऊपर चला जाता था ।

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वे उद्‌दंड किसानों से सीधा निपट सकते थे । इस प्रथा से खेती का नए क्षेत्रों में विस्तार करना भी संभव हुआ । साथ ही विजित जनजातीय क्षेत्रों में बसाए गए ब्राह्मण वहाँ के मूलवासियों को आसानी से यह शिक्षा दे सकते थे कि वे वर्णव्यवस्था को मानें राजा की आज्ञा का पालन करें और उसे कर चुकाएँ ।


Essay # 2. मध्यकालीन भारत में भूस्वामियों का उदय (Rise of Landowners in Medieval India):

भूमि अनुदान की प्रथा ईसा की पाँचवीं सदी से तेजी पकड़ती गई । इस प्रथा के अनुसार ब्राह्मणों को सारे कर चुकाने की छूट के साथ भूमि दी जाती थी । गाँवों से राजा जितने भी करों की उगाही करता था उन सबों की उगाही का अधिकार ब्राह्मणों को मिल जाता था ।

इसके अलावा अनुदान-ग्रामों में बसने वाले लोगों पर शासन करने का अधिकार भी दानग्राही पाते थे । सरकारी अधिकारियों और राजा के परिचर दान किए गए गाँवों में प्रवेश नहीं कर सकते थें । ईसा की पाँचवीं सदी तक चोरों को सजा देने का अधिकार राजा सामान्यत: अपने ही हाथ में रखता था परंतु बाद में सभी प्रकार के अपराधियों को सजा देने का अधिकार दानग्राहियों को दिया जाने लगा ।

इस प्रकार दानग्राही ब्राह्मण किसानों और शिल्पियों से करों की वसूली करने के साथ-साथ अपने गाँव में शांति व्यवस्था का काम भी करने लगे । ब्राह्मणों को दिया गया दान शाश्वत् अर्थात् सदा स्थायी होता था । अत: गुप्तकाल के बाद से राजा की शक्ति बहुत ही घटने लगी ।

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मौर्यकाल में कर का निर्धारण और वसूली राजा के कारिंदे करते थे और वे ही शांति-व्यवस्था को देखते थे । परंतु भूमि अनुदानों के फलस्वरूप ऐसे-ऐसे इलाके बन गए जो राजकीय नियंत्रण के बाहर आ गए । अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि देने की प्रथा ने राज्य-नियंत्रित क्षेत्र को संकुचित कर दिया ।

मौर्यकाल में छोटे से बड़े तक सभी अधिकारियों को वेतन सामान्यत: नगद चुकाया जाता था । यह प्रणाली कुषाणों के अमल में भी चलती रही जिन्होंने भारी संख्या में तांबे और सोने के सिक्के जारी किए । यही प्रथा किसी-न-किसी तरह गुप्तकाल में भी चलती गई जिन्होंने स्वर्ण-मुद्राएँ स्पष्टत: सेना और उच्च अधिकारियों के वेतन चुकाने के लिए ढलवाई थी ।

लेकिन ऐसा लगता है कि छठी सदी में स्थिति बदल गई । उस सदी की स्मृतियों में कहा गया है कि वेतन के बदले भूमि दी जा सकती है । तदनुसार हर्षवर्धन के समय से अधिकारियों को वेतन भू-राजस्व के रूप में दिया जाता रहा । राज्य की आय का चौथा हिस्सा उच्च अधिकारियों के वेतन-भुगतान की मंद में संचित किया जाने लगा ।

गवर्नरों या राज्य प्रतिनिधियों को तथा मंत्रियों दंडनायकों और अधिकारियों को भूमि का कुछ अंग निजी भरण-पोषण के लिए दिया जाता था । इन सब के फलस्वरूप राजा के प्रभुत्व क्षेत्र को हड़पते हुए भूस्वामी पैदा हुए ।


Essay # 3. मध्यकालीन भारत और नई कृषि अर्थव्यवस्था (New Agricultural Economy during Medieval India):

कृषि अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा परिवर्तन आया । भूस्वामी न खुद अपनी जमीन आबाद कर सकते थे और न ही कर की वसूली कर सकते थे । असल में खेती का काम उन किसानों या बटाईदारों को सौंपा जाता था जो जमीन से जुड़े तो थे पर कानूनन वे उसके हकदार नहीं थे ।

चीनी यात्री इ-त्सिंग ने कहा है कि अधिकांश बौद्ध विहार अपने नौकर-चाकर से खेती कराते थे । हुआन सांग ने शूद्रों को कृषक बतलाया है । इससे यह ज्ञात होता है कि शूद्र दासों या कृषि-मजदूरों के रूप में खेती का काम करना छोड़ रहे थे शायद उनका अस्थायी तौर पर जमीन पर कब्जा हो रहा था । ऐसा उत्तर भारत की पुरानी बस्तियों में हुआ होगा ।

जब जनजातीय इलाकों में गाँव अनुदान में दिया जाता था तब इस गाँव के कृषक अनुदान लेने वाले व्यक्ति के हाथ सौंप दिए जाते थे । ये भूस्वामी सामान्यत: ब्राह्मण होते थे क्योंकि पाँचवीं-छठी सदियों से ही बड़े पैमाने पर गाँव ब्राह्मणों को दान में दिए जाते रहे ।

छठी सदी से ही उड़ीसा दकन आदि पिछड़े पहाड़ी क्षेत्रों के बटाईदारों और किसानों से खास तौर से कहा जाता था कि वे दी गई भूमि पर कायम रहें । वहाँ से यह परिपाटी गंगा के मैदान में भी फैली । सातवीं सदी में गया और नालंदा के अभिलेख में शिल्पियों और किसानों से कहा गया है कि वे दान वाले गाँवों को नहीं छोड़े । अत: वे एक गाँव को छोड़ दूसरे गाँव नहीं जा सकते थे; उसी गाँव में रहकर वहाँ की सभी आवश्यकताओं को यथासाध्य पूरा किया करते थे ।


Essay # 4. मध्यकालीन भारत में व्यापार का ह्रास और प्राचीन नगरों का पतन (Degradation of Business and Collapse of Ancient Cities in Medieval India):

ईसा की छठी सदी से व्यापार का ह्रास होने लगा । पश्चिमी रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार तीसरी सदी में ही समाप्त हो गया था तथा ईरान और बायजेंटियम के साथ रेशम का व्यापार छठी सदी के मध्य में आकर बंद हो गया । भारत का चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ कुछ-कुछ व्यापार चलता था परंतु इसका लाभ अरब लोगों के हाथ में चला जाता था जो बिचौलिए का काम करते थे ।

इस्लाम का उदय होने के पूर्वकाल में अरब लोगों ने वास्तव में भारत के निर्यात व्यापार को लगभग पूरा-पूरा हथिया लिया था । छठी सदी के बाद लगभग 300 वर्षों से भी अधिक समय तक व्यापार गिरा रहा । इस बात का प्रबल प्रमाण है देश में स्वर्ण-मुद्राओं का लगभग पूरा-पूरा गायब हो जाना । इस अवधि में सिक्कों की कमी उत्तर भारत में ही नहीं दक्षिण भारत में भी दिखाई देती है ।

व्यापार का ह्रास नगरा के बुरे दिन आए । नगरों का उत्थान दकन, पश्चिम और उत्तर भारत में सातवाहनों और कुषाणों के राज्यकाल में हुआ था । कुछ नगर गुप्तकाल में तो फूलते-फलते रहे, लेकिन गुप्तोत्तर काल में उत्तर भारत के बहुत-सारे पुराने वाणिज्य नगर उजाड़ हो गए ।

उत्खननों से पता चलता है कि हरियाणा और पूर्वी पंजाब के कई नगर, पुराना किला (दिल्ली), मथुरा हस्तिनापुर (जिला मेरठ), श्रावस्ती (उत्तर प्रदेश), कौशांबी (इलाहाबाद के निकट), राजघाट (वाराणसी), चिराँद (सारन जिला) वैशाली और पाटलिपुत्र गुप्तकाल में ही पतोन्मुख हो गए थे और गुप्तोत्तर काल में ही अधिकांश लुप्त हो गए ।

चीनी यात्री हुआन सांग ने बुद्ध के जीवन से संबद्ध कई नगरों में भ्रमण किया तो देखा कि वे या तो उजड़ गए हैं या जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं । भारत के माल के लिए विदेशों में बहुत कम बाजार रह गया इसलिए इन नगरों में रहने वाले शिल्पी और वणिक देहांत चले गए और वहाँ खेती करने लगे ।

पाँचवीं सदी के उत्तरार्द्ध में रेशम बुनकरों की एक टोली पश्चिमी समुद्रतट को छोड्कर मालवा के मंदसोर में आ बसी और वहाँ रेशम की बुनाई छोड्‌कर दूसरे पेशे को अपनाया । व्यापार और नगरों का ह्रास हो जाने पर गाँव के लोगों को तेल, नमक, मसाला, कपड़ा आदि वस्तुओं के बारे में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति खुद ही करनी पड़ी । इससे उत्पादन की छोटी-छोटी इकाइयाँ उभरीं हर इकाई अपनी आवश्यकता की पूर्ति करती थी ।

वर्णव्यवस्था में परिवर्तन:

छठी सदी के बाद समाज के ढाँचे में कुछ बदलाव आए । उत्तर भारत के गंगा के मैदान में वैश्य स्वतंत्र किसान माने जाते थे परंतु ग्राम अनुदानों ने उनके और राजा के बीच भूस्वामियों को लाकर खड़ा कर दिया जिससे वैश्यों की हैसियत वही हो गई जो शूद्रों की थी । इस प्रकार पुरानी समाज-व्यवस्था में अंतर आ गया ।

सामाजिक ढाँचे का यह परिवर्तन उत्तर भारत से बंगाल और दक्षिण भारत में भी फैल गया जहाँ पाँचवीं से सातवीं सदियों तक ब्राह्मणों को उत्तर भारत से बुला-बुला कर भूमि अनुदान दिया जाता रहा । अत: बाह्य क्षेत्रों में हम केवल दो वर्ण पाते हैं- ब्राह्मण और शूद्र ।

बार-बार सत्ता हथियाते और भूमि अनुदान पाते-पाते कई कोटि के भूस्वामी पनप उठे । जब कोई सत्ता और भूमि हथिया लेता था तो वह सहज ही समाज में ऊँचा स्थान पाना चाहता था । वह भले ही निम्न वर्ण का हो अपने स्वामी से भूमिदान पा लेता था ।

इससे कठिनाइयों पैदा होने लगी क्योंकि आर्थिक संपन्नता के बावजूद उसकी स्थिति सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से निम्न होती थी । धर्मशास्त्र के अनुसार सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार वर्ण ही होता था । समाज चार वर्णों में विभक्त था जिसमें सबसे ऊपर ब्राह्मण और सबसे नीचे शूद्र थे ।

किसी व्यक्ति को आर्थिक अधिकार भी उसके वर्ण के अनुसार ही मिलता था । अत: इन नए भूस्वामियों के विभिन्न वर्गों को उपयुक्त स्थान देने के लिए शास्त्रों में कुछ परिवर्तन करना आवश्यक हो गया । छठी सदी में हुए वराहमिहिर नामक ज्योतिषी ने निवास गहों का आकार चार वर्णों के लिए अलग-अलग बताया, जैसा कि पहले से चला आ रहा था ।

परंतु उसने इसके साथ ही भिन्न-भिन्न कोटि के शासकों के लिए भी निवासगृहों के अलग-अलग आकार निर्धारित किए । इस तरह पूर्व के समाज में हर वस्तु का वर्गीकरण वर्ण के अनुसार होता था पर अब हस्तगत भूमिसंपदा की मात्रा के अनुसार वर्गीकरण शुरू हो गया ।

सातवीं सदी के बाद अनगिनत जाति-उपजातियाँ पैदा हुई । पूर्व मध्यकाल का एक पुराण बतलाता है कि वैश्य वर्ण की स्त्री के निम्न वर्ण के पुरुष के संयोग से हजारों वर्णसंकरों की उत्पत्ति हुई । इसका अर्थ हुआ कि शूद्र और अंत्यज असंख्य उपजातियों में बँट गए ।

यही हाल हुआ ब्राह्मणों का और उन राजपूतों का भी जो सातवीं सदी के आसपास भारतीय राज्यव्यवस्था और समाज में आगे आए । जातियों की संख्या बढ़ाने में उस नई अर्थव्यवस्था का भी हाथ रहा जिसमें लोग एक स्थान छोड़ दूसरे स्थान को नहीं जा सकते थे । एक ही तरह के व्यवसाय में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में एक ही लोग अपने-अपने क्षेत्र के अनुसार भिन्न-भिन्न उपजातियों में बँट गए ।

इसके अतिरिक्त जनजातीय क्षेत्रों में जहाँ भूमि अनुदान पाकर ब्राह्मण बस गए वहाँ के जनजातीय लोग ब्राह्मण समाज में शामिल कर लिए गए और इसमें अधिकतर लोगों को शूद्र और मिश्रित जाति का मान लिया गया । इस प्रकार प्रत्येक जनजाति या कुल को ब्राह्मण समाज में अलग जाति के रूप में शामिल कर लिया गया ।


Essay # 5. मध्यकालीन भारत में क्षेत्रीय पहचान (Regional Identification during Medieval India):

छठी-सातवीं सदियों के आसपास देश में कई सांस्कृतिक इकाइयों का उदय हुआ जो बाद में असम, आंध्र, उड़ीसा, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु, बंगाल, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि नामों से प्रसिद्ध हुईं । इस तरह के सांस्कृतिक समूहों के अस्तित्व को विदेशी और देशी दोनों स्रोतों ने स्वीकार किया है ।

चीनी यात्री हुआन सांग ने कई राष्ट्रीय समवायों या जनगणों का उल्लेख किया है । आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध में रचित कई जैन ग्रंथों में 18 प्रमुख जनगणों अथवा उपराष्ट्रीय समूहों की चर्चा है ।

इसमें सोलह के शारीरिक लक्षण भी वर्णित हैं उनकी भाषा के नमूने दिए गए हैं और उनके चरित्रों के बारे में भी कुछ बातें कहीं गई है । नौवीं सदी का नाटककार विशाखदत्त कहता है कि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में आचार-व्यवहार, वेश-भूषा और भाषा वाले लोग बसते हैं ।


Essay # 6. मध्यकालीन भारत में साहित्य (Literature during Medieval India):

ईसा की सातवीं सदी से हम भारतीय भाषाओं के इतिहास में अद्‌भुत गतिविधि पाते हैं । पूर्वी भारत की बौद्ध कृतियों में बांग्ला, असमिया, मैथिली, उड़िया और हिंदी के उद्‌भव का मंद आभास पाया जाता है । इसी प्रकार इसी काल की जैन प्राकृत की रचनाओं में गुजराती और राजस्थानी का आरंभ दिखाई देता है ।

दक्षिण में तमिल तो सबसे पुरानी भाषा थी लेकिन कन्नड़ का उद्‌भव इसी समय आरंभ होता है जबकि तेलुगु और मलयालम बहुत बाद में विकसित हुईं । लगता है प्रत्येक प्रदेश के अन्य प्रदेशों से अलग रहने के कारण हर प्रदेश में उसकी अपनी- अपनी भाषा बनने लगी ।

गुप्त साम्राज्य के विघटित होने पर बहुत-से छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य उदित हुए जिससे सहज ही देशव्यापी संचार और संपर्क में बाधा पड़ी । व्यापार में गिरावट आने के फलस्वरूप भी एक प्रदेश का दूसरे प्रदेश से संपर्क टूटा और इससे क्षेत्रीय भाषाओं के उद्‌भव को बल मिला ।

क्षेत्रीय लिपियों को सातवीं सदी में और उसके बाद में प्रमुखता मिली । मौर्यकाल से गुप्तकाल तक लिपि में परिवर्तन होते रहे लेकिन देश के अधिकांश भाग में आमतौर पर एक ही लिपि चलती रही ।

अत: जो कोई गुप्तकाल की लिपि पढ़ने में कुशल हो जाएगा वह उस काल के विभिन्न प्रदेशों में प्राप्त अभिलेखों को भी पड़ सकेगा । लेकिन सातवीं सदी से प्रत्येक क्षेत्र में अपनी-अपनी लिपि विकसित हुई । इसलिए जो क्षेत्रीय लिपियों का जानकार नहीं रहेगा वह गुप्तोत्तर काल में देश के भिन्न-भिन्न भागों में पाए गए अभिलेखों को नहीं पढ़ सकेगा ।

छठी-सातवीं सदियाँ संस्कृत साहित्य के इतिहास में भी समान रूप से महत्व की हैं । शासक वर्ग ईसा की दूसरी सदी से ही संस्कृत का प्रयोग करते आ रहे थे । शासक स्वयं शान-शौकत से रहते थे । अत: उनकी भाषा भी शब्दाडंबरपूर्ण और अलंकृत होती गई ।

संस्कृत गद्य और पद्य की अलंकृत शैली सातवीं सदी से ही जोर पकड़ती गई । प्राचीन परंपरा के संस्कृत पंडितों को आज भी अलंकृत शैली बहुत पसंद है । गद्य में शब्दाडांबर की पराकाष्ठा बाणभट्‌ट की कृतियों में देखी जाती है । यद्यपि बाण की गद्य शैली का अनुकरण करना आसान नहीं था तथापि मध्यकाल के संस्कृत लेखकों ने उसी गद्य शैली को अपना आदर्श बनाया ।

मध्यकाल में प्राचीन मूलग्रंथों पर टीकाएँ लिखी गईं । ये टीकाएँ संस्कृत पालि और प्राकृत मूलग्रंथों पर पाँचवी से अठारहवीं सदियों के बीच लिखी गईं । इनमें केवल धर्मशास्त्र और स्मृतियों ही नहीं, बल्कि पाणिनि का व्याकरण, गृह्यसूत्र, सूल्वसूत्र और चिकित्सा तथा दार्शनिक ग्रंथ भी शामिल थे ।

पालि मूलग्रंथों पर की गई टीकाओं को अट्‌टकथा और प्राकृत मूलपाठों पर की गई टीकाओं को चूर्णि भाष्य तथा निर्युक्ति कहते हैं । टीकात्मक साहित्य ने बौद्धिक जीवन में सत्तावादी प्रवृत्ति को बल प्रदान किया और राज्य तथा वर्ग पर आधारित पितृसत्तात्मक समाज को सुरक्षित रखने और उसे नई परिस्थितियों के अनुकूल ढालने का प्रयास किया । 600 ई॰ से 900 ई॰ के बीच अनेक विधिग्रंथों की भी रचना हुई ।


Essay # 7. मध्यकालीन भारत में दैवी अनुक्रम (Divine Sequence during Medieval India):

सातवीं-आठवीं सदियों से मूर्ति और मंदिर के निर्माण की शैली हर प्रदेश में अलग-अलग हो गई । विशेषकर दक्षिण भारत तो मानो प्रस्तर-मंदिरों का क्षेत्र बन गया । पत्थर और कौसा ये दो ऐसे माध्यम थे जिनके सहारे देवता साकार किए गए । कांस्य-प्रतिमाएँ बड़े पैमाने पर बनने लगीं ।

यद्यपि कांस्य-प्रतिमाएँ भारी संख्या में हिमालयी प्रदेशों में भी मिलती है तथापि ये दक्षिण भारत में इसलिए अधिक पाई जाती हैं क्योंकि ब्राह्मण धर्म के मंदिरों में इनकी आवश्यकता हुई और पूर्वी भारत में इसलिए अधिक मिलती हैं कि बौद्ध मंदिरों और विहारों में इनकी आवश्यकता हुई । यद्यपि एक ही देवता देश के एक छोर से दूसरे छोर तक पूजे जाते थे फिर भी हर प्रदेश के लोगों ने उनकी मूर्ति का निर्माण अपनी-अपनी रीति से किया ।

गुप्तोत्तर काल में हमें कुछ धार्मिक परिवर्तन भी दिखाई देते है । देवमाला में देवताओं को स्थान उनकी श्रेष्ठता के क्रम से दिया जाने लगा । जिस तरह कर्मकांड, भूमि-संपत्ति, सैनिक-शक्ति आदि के आधार पर समाज असमान वर्गों में बँटा हुआ था उसी तरह देवगण भी असमान कोटियों में बाँट दिए गए ।

विष्णु, शिव और दुर्गा ये तीनों मुख्य देवता के रूप में गृहीत हुए, और कई अन्य देव और देवियाँ उनके अधीन या गौण देवता माने गए । ऐसे देवता परिचरों और अनुचरों के रूप में मुख्य देवता के नीचे रखे गए । हम ब्रह्मा, गणपति, विष्णु, शक्ति और शिव इन पाँच देवताओं की पूजा प्रचलित पाते हैं, जो सम्मिलित रूप से पंचदेवता कहलाते हैं ।

मुख्य देवता शिव या किसी अन्य देव या देवी को मुख्य मंदिर में स्थापित किया जाता था और उसके चारों ओर बने चार गौण मंदिरों में चार अन्य देवता रखे जाते थे । ऐसे मंदिर को पंचायतन कहा जाता था । वैदिक देव इंद्र, वरूण और यम का दर्जा घट गया और वे लोकपाल की कोटि में आ गए ।

आरंभिक मध्यकाल की देवमालाओं के अवलोकन से प्रकट होता है कि सांसारिक सोपानक्रमिक वर्गभेद के अनुरूप ही देवों में भी वर्गभेद बनाया गया । कई देवमालाओं में मातृदेवी को अन्य देवताओं से ऊँचा स्थान दिया गया । हमें न केवल शैवों, शाक्तों और वैष्णवों के ऐसे देवमंडल मिलते हैं बल्कि जैनों और बौद्धों के भी मिलते हैं जिनमें देव अपनी हैसियत के क्रम से अंकित और स्थापित होते हैं ।

जैनों, शैवों और वैष्णवों आदि के संघटन भी श्रेणीबद्ध हो गए और पाँच पंक्तियों में बँट गए । सबसे ऊपर की पंक्ति आचार्य को मिली जिसका अभिषेक उसी तरह होने लगा जिस तरह राजा का । उसके नीचे उपाध्याय, उपासक आदि होते थे ।

भक्ति संप्रदाय  (Devotion Sect):

सातवीं सदी से भक्ति संप्रदाय देश भर में फैल गया दक्षिण में तो और भी । भक्ति का अर्थ था अपने आराध्य देव को सब कुछ समप्रित कर देना और उसके प्रतिफल में केवल आराध्य देव की कृपा प्राप्त करना । इसका आशय यह हुआ कि भक्ति मार्ग का साधक अपने आराध्य के प्रति पूर्ण आत्मसमप्रण कर देता था । इसकी तुलना किसानों के अपने भूस्वामियों के ऊपर पूर्णत: आश्रित रहने की स्थिति में कर सकते हैं ।

जिस तरह किसान समप्रण की भावना से अपने भूस्वामी की सेवा करता था और भूस्वामी की कृपा से जोतने के लिए भूमि और रक्षा पाता था उसी तरह का संबंध भक्त और भगवान के बीच बन गया । चूंकि सामंतवाद का रंग इस देश में दीर्घकाल तक जमा रहा इसलिए भारतीय लोकाचार में भक्ति की जडें भली-भाँति जम पाईं ।

तंत्रवाद:

ईसा की छठी सदी के आसपास से भारत में धर्म के क्षेत्र में तांत्रिक संप्रदाय का फैलना सबसे बड़ी घटना है । पाँचवी-सातवीं सदियों में नेपाल, असम, बंगाल, उड़ीसा, मध्य भारत और दकन में बहुत-से ब्राह्मणों को ग्रामदान मिले और लगभग इसी अवधि में तांत्रिक ग्रंथों तांत्रिक पीठों और तांत्रिक साधनाओं का प्रचार हुआ ।

तंत्र मार्ग में स्त्री और शूद्र दोनों के लिए द्वार खुला था और इसमें जादुई अनुष्ठान प्रमुख थे । कुछ अनुष्ठान पहले से भी चलते रहे होंगे किंतु ईसा की छठी सदी के आसपास से इन्हें सुव्यवस्थित करके तांत्रिक ग्रंथों के रूप में लिखा जाने लगा । इन अनुष्ठानों का उद्देश्य धन-संपत्ति आदि की प्राप्ति तथा आधि-व्याधियों से विमुक्ति था ।

निसंदेह तंत्र मार्ग का उदय ब्राह्मण समाज में जनजातियों के बड़े पैमाने पर प्रवेश होने के कारण हुआ । ब्राह्मणों ने उनके बहुत-सारे अनुष्ठानों जादू-टोनों और धार्मिक प्रतीकों को अपनाया और उन्हें प्रामाणिक रूप में संकलित करके खूब चलाया । धीरे-धीरे ब्राह्मणों और पुरोहितों ने अपने धनवान यजमानों के हितार्थ इनमें मनमाना हेर-फेर भी किया ।

तंत्र मार्ग जैन बौद्ध शैव और वैष्णव संप्रदायों में घुस गया । सातवीं सदी से लेकर सारे मध्यकाल में तांत्रिक मार्ग जमा रहा । देश के विभिन्न भागों में पाई गई अनेक पांडुलिपियाँ तांत्रिक साधना और ज्योतिष के विषय की हैं और ये दोनों आपस में मिल-से गए हैं ।


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