औद्योगिक विकास: चरण और प्रभाव | Read this article in Hindi to learn about:- 1. हॉफमैन द्वारा औद्योगिक विकास की प्रतिपादित सिद्धान्त (Hoffman’s Thesis of Industrial Development) 2. औद्योगिक विकास के प्रतिकृति की हॉफमैन द्वारा  व्याख्या (Analysis of Hoffmann’s Pattern of Industrial Development) and Other Details.

Contents:

  1. हॉफमैन द्वारा औद्योगिक विकास की प्रतिपादित सिद्धान्त (Hoffman’s Thesis of Industrial Development)
  2. औद्योगिक विकास के प्रतिकृति की हॉफमैन द्वारा  व्याख्या (Analysis of Hoffmann’s Pattern of Industrial Development)
  3. हॉफमैन की जाँच के निष्कर्ष एवं अनुभवसिद्ध प्रमाण (Empirical Evidence and Hoffmann’s Findings)
  4. हॉफमैन की औद्योगिक विकास की अवस्थाएं (Hoffman’s Stages of Industrial Development)
  5. हॉफमैन की व्याख्या के निहितार्थ (Implications of Hoffmann’s Analysis)
  6. औद्योगिक विकास के आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Appraisal of Industrial Development)

1. हॉफमैन द्वारा औद्योगिक विकास की प्रतिपादित सिद्धान्त (Hoffman’s Thesis of Industrial Development):

हाफमैन ने विभिन्न देशों में औद्योगिक क्षेत्रों की वृद्धि के सन्दर्भ में विकास के चरम या अवस्थाओं का विवेचन किया । उन्होंने अपना विश्लेषण चेनरी से पहले ही प्रस्तुत कर दिया था । औद्योगीकरण की प्रक्रिया में उन्होंने सामान्य एवं उद्योगों के विभिन्न वर्गों के सन्दर्भ में विशिष्ट प्रवृत्तियों को सामने रखा ।

हॉफमैन ने लम्बी समय अवधियों में अन्तर्राष्ट्रीय तुलनाओं की शृंखला के द्वारा यह जानने का प्रयास किया कि औद्योगिक वृद्धि में क्या कुछ नियमित प्रतिकृतियाँ विद्यमान है जिनकी पहचान की जा सके । ऐसा ही प्रयास चेनरी के द्वारा किया गया था लेकिन दोनों अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रयुक्त विधि में भिन्नता थी ।

ADVERTISEMENTS:

हॉफमैन ने अपने निष्कर्ष काल श्रेणी समंकों द्वारा प्रस्तुत किये न कि अनुप्रस्थ काट व्याख्या) द्वारा । हॉफमैन ने अपने अध्ययन में विकास प्रक्रिया की अवधि में उद्योगों के विभिन्न वर्गों के प्रमुख होने की अवस्था के अधीन एक दूसरे से सम्बद्ध घटनाओं के क्रम को प्रस्तुत किया । हॉफमैन के नतीजे समय के दीर्घ कालिक विस्तार में ऐतिहासिक समंकों के निर्वचन का परिणाम थे ।

हॉफमैन की संकल्पनाएँ (Hypothesis of Hoffmann):

हॉफमैन के सवेंक्षण का मुख्य लक्ष्य यह जानकारी प्राप्त करना है कि विभिन्न देशों में औद्योगीकरण की प्रक्रिया में कुछ उद्योग किस प्रकार एक अवस्था अविष्ट में अधिक महत्वपूर्ण होते है तथा अन्य उद्योग अन्य अवस्थाओं में ।

हॉफमैन की आधारभूत संकल्पना यह है कि आरम्भिक अवस्था में, औद्योगीकरण उपभोक्ता वस्तु उद्योगों की ओर अधिक केन्द्रित होता है या इनकी ओर झुकाव रखता है । अतः औद्योगीकरण के आरम्भिक पक्ष में उपभोक्ता वस्तु उद्योग औद्योगिक उत्पादन का अधिक भाग या शेयर उत्पादित करते है । दूसरी तरफ पूंजी उद्योग औद्योगीकरण की बाद की अवस्थाओं में महत्वपूर्ण होते है ।


2. औद्योगिक विकास के प्रतिकृति की हॉफमैन द्वारा  व्याख्या (Analysis of Hoffmann’s Pattern of Industrial Development):

ADVERTISEMENTS:

हॉफमैन के अनुसार व्यक्तिगत उद्योगों में अंतर्निहित विभिन्न वृद्धि पथों में अन्तर्निहित मुख्य कारक सामान्य एवं क्रमिक संरचनात्मक परिवर्तन है जिससे होकर एक अर्थव्यवस्था गुजरती है । हॉफमैन की विश्लेषणात्मक पद्धति मुख्यतः उद्योगों के द्विवर्गीय वर्गीकरण पर आधारित है, जिसमें एक ओर पूंजी वस्तु उद्योग तथा दूसरी ओर उपभोक्ता वस्तु उद्योग है ।

उपभोक्ता वस्तु उद्योगों को हॉफमैन ने चार वर्गों में विभक्त किया:

(i) खाद्य पदार्थ, पेय एवं तम्बाकू

(ii) कपड़ा एवं वस्त्र जिसमें फुटवियर भी सम्मिलित हैं

ADVERTISEMENTS:

(iii) चमड़े की वस्तुएँ

(iv) फर्नीचर

पूँजी वस्तु उद्योगों को भी हॉफमैन ने चार वर्गों में विभक्त किया:

(i) लौह एवं अलौह धातुयें

(ii) मशीनरी

(iii) वाहन एवं

(iv) रसायन ।

यह उद्योग समस्त उद्योगों के विशुद्ध उत्पादन का लगभग दो तिहाई भाग समाहित करते हैं । हॉफमैन ने एक अर्थव्यवस्था में विकास के अंश या अवस्थाओं के सूचक के रूप में उपभोक्ता वस्तु उद्योगों एवं पूंजी वस्तु उद्योगों के विशुद्ध उत्पादन के मध्य विद्यमान अनुपात का प्रयोग किया ।

एक देश के विकास की समय अवधि के मध्य इस अनुपात के मूल्य में होने वाला परिवर्तन विकास के अंश में होने वाले परिवर्तन या भिन्नता को सूचित करता है । इस अनुपात का मूल्य जितना कम होगा विकास का अंश उतना ही अधिक होगा ।

अतः एक अर्थव्यवस्था के विकास के अंश को (अंत समय सम्बन्धी तुलना के सन्दर्भ में) तब जाना जा सकता है जब एक दिए हुए समय में समय के विभिन्न बिन्दुओं पर इस अनुपात के विस्तार को जाना जा सके । इसके द्वारा विकास के अंश के प्रति अन्तर्देशीय अनुप्रस्थ काट तुलनाएं करने में मदद मिलती है ।


3. हॉफमैन की जाँच के निष्कर्ष एवं अनुभवसिद्ध प्रमाण (Empirical Evidence and Hoffmann’s Findings):

यह जांचने के लिए कि औद्योगिक वृद्धि क्या वास्तव में एक नियमित प्रतिकृति का अनुसरण करती है, हॉफमैन ने समय की दीर्घ अवधियों में अन्तर्राष्ट्रीय तुलनाओं की एक श्रेणी को ध्यान में रखा । उन्होंने आय के विभिन्न स्तरों वाले देशों के काल श्रेणी समंकों के आधार पर तुलना की ।

विकास प्रक्रिया में जैसे-जैसे समय के पैमाने से ऊपर बढते हैं, तब सभी देशों में उपभोक्ता वस्तुओं के शुद्ध उत्पादन एवं पूंजी वस्तुओं के शुद्ध उत्पादन में कमी आती है । यह विकास के अंश की आरोही क्रम में प्रगतिशील दशा का सूचक है । दूसरी तरफ, एक दिए हुए समय में इस अनुपात के मूल्य में दिखाई देने वाले अर्न्तदेशीय अन्तर विकास के अंश में अन्तर्राष्ट्रीय विभेदों को प्रदर्शित करते है ।


4. हॉफमैन की औद्योगिक विकास की अवस्थाएं (Hoffman’s Stages of Industrial Development):

औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के विकास की चार अवस्थाओं को हॉफमैन ने निर्दिष्ट किया:

पहली अवस्था- ऐसी अर्थव्यवस्थाएँ जहाँ अनुपात 5 (±1) : 1 है ।

दूसरी अवस्था- ऐसी अर्थव्यवस्थाएँ जहाँ अनुपात 25 (±1) : 1 है ।

तीसरी अवस्था- ऐसी अर्थव्यवस्थाएँ जहाँ अनुपात 1 (± 5 : 1) : 1 है ।

चौथी अवस्था- ऐसी अर्थव्यवस्थाएँ जहाँ अनुपात 0.5 से कम है ।

विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं में औद्योगिक प्रतिकृति का अध्ययन औद्योगीकरण की पहली अवस्था में दो प्रवृतियों का प्रदर्शन करता है । औद्योगीकरण की इस अवस्था में कपडा व सूती वस्त्र उद्योग का सापेक्षिक बाहुल्य कुछ देशों में दिखाई देता है, जबकि अन्य देशों में खाद्य एवं पेय उद्योग सापेक्षिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण रहे ।

कपडा व सूती वस्त्र उद्योग की बहुलता ब्रिटेन, फ्रांस, जापान व भारत में औद्योगीकरण की प्रथम अवस्था में दिखाई देता है । यह सुविदित तथ्य है कि ब्रिटेन में सूती वस्त्रोद्योग, फ्रांस में ऊन उद्योग, जापान में सिल्क उद्योग शीर्ष पर थे । प्रारम्भिक विकास अवस्था में भारत कपडा उद्योग में सबसे आगे था ।

दूसरी ओर खाद्य एवं पेय उद्योग बेल्जियम, अर्जेन्टाइना व न्यूजीलैण्ड में सर्वाधिक उल्लेखनीय रहे । इस सूची का पुन विभाजन इस तथ्य के द्वारा किया गया कि खाद्य व पेय उद्योग में प्रयुक्त किया गया कच्चा माल प्राथमिक रूप से शाकाहारी स्त्रोतों से प्राप्त किया जाता रहा या पशुओं द्वारा ।

इस आधार पर शाकाहार आधारित खाद्य व पेय उद्योग जैसे अनाज पीसने की मिलें बेल्जियम में व पशु आधारित खाद्य व पेय उद्योगों में डेयरी उद्योग सापेक्षिक रूप से न्यूजीलैण्ड में प्रमुख पाई गई ।

हॉफमैन की परिभाषानुसार औद्योगीकरण की द्वितीय अवस्था में कुल औद्योगिक उत्पादन में उपभोक्ता वस्तु उद्योगों की प्रभावपूर्ण बनी रहती है लेकिन उनकी सापेक्षिक दशा में परिवर्तन दिखाई देता है ।

उदाहरण के लिए जब जापान में दूसरी अवस्था दिखाई दी जो सूती वस्त्र उद्योग पहले क्रम में स्थान पा गया । दूसरी अवस्था में बेल्जियम में अनाज मिलों की दशा खिसक कर दूसरे स्थान पर आ गई व चीनी शोधन इकाइयाँ प्रथम क्रम में आ गई ।

विकास की तीसरी अवस्था में बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में बिटेन, जर्मनी, स्वीडन व यू॰ एस॰ ए॰ पहुँचे । इनमें ब्रिटेन की तुलना में जर्मनी, स्वीडन व यू॰ एस॰ ए॰ में अधिक तीव्र वृद्धि दरें देखी गई, जबकि औद्योगिक क्रान्ति का सूत्रपात ब्रिटेन में इनसे पहले हो गया था ।

औद्योगीकरण की तीसरी अवस्था में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पूंजी वस्तु उद्योग लौह-इस्पात व इंजीनियरिंग उद्योग थे । इन उद्योगों की वृद्धि प्राकृतिक संसाधन आधार अन्य प्रकृतिदत्त सुविधाओं. बाजार के आकार व शृंखला प्रभाव पर निर्भर करता था । स्वीडन में लौह व इस्पात उद्योग स्थापित होने का मुख्य कारक प्रकृतिदत्त सुविधाएँ थीं ।

अमेरिका में बाजार के आकार के विस्तृत होने के कारण इंजीनियरिंग व लौह-इस्पात उद्योग को प्रेरणा प्राप्त हुई । इसके साथ ही कृषि के यन्त्रीकरण से इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए निरन्तर बढता हुआ घरेलू बाजार मिला । इसने लौह एवं इस्पात उद्योग को भी प्रेरित किया ।

प्रथम विश्व युद्ध के उपरान्त लौह एवं इस्पात उद्योग के लिए विदेशी बाजार मिले । अत: इस उद्योग को तुलनात्मक लाभ प्राप्त हुआ, विशेषतः स्वीडन में जो लौह एवम् इस्पात में दीर्घ अनुभव व उत्पादन कौशल से पूर्ण था ।


5. हॉफमैन की व्याख्या के निहितार्थ (Implications of Hoffmann’s Analysis):

i. हॉफमैन की व्याख्या का सैद्धान्तिक ढाँचा कुछ ऐसे अर्न्तनिहित कारकों को स्पष्ट करता है जो व्यावहारिक रूप से सत्य सिद्ध हुए:

उदाहरण के लिए ऐसे कुछ पूर्ववर्ती स्पष्टीकरण यह प्रदर्शित करने के लिए विद्यमान थे कि अर्थव्यवस्था में इसके औद्योगीकरण की विभिन्न अवस्थाओं में उपभोक्ता-वस्तु उद्योगों व पूँजी-वस्तु उद्योगों में की सापेक्षिक महत्ता के परिवर्तनशील अंश होते है, यह एक सुस्पष्ट तथ्य है कि पूंजी वस्तुओं की माँग व्यूत्पन्न माँग है, जबकि उपभोक्ता वस्तुओं की माँग स्वयं के लिए की जाती है ।

पूंजी वस्तुओं की माँग तब होती है जब उनकी आवश्यकता उपभोक्ता वस्तुओं या अन्य पूंजी वस्तुओं के उत्पादन में होती है । अतः जब तक एक अर्थव्यवस्था आर्थिक वृद्धि की आरम्भिक अवस्था में होती है तो पूंजी वस्तुओं की माँग सापेक्षिक रूप से अल्प होगी ।

पूंजी वस्तुओं के उत्पादन के लिए बडे पैमाने की उत्पादन इकाइयों की आवश्यकता होती है जो आर्थिक रूप से गतिशील हों । जब पूंजी वस्तुओं की माँग पर्याप्त रूप से अधिक न हो तब विकासशील देशों के पास आर्थिक रूप से बेहतर विकल्प यह है कि वह इन वस्तुओं का आयात अधिक उन्नत देशों से करें । इस प्रकार हॉफमैन ने उन दशाओं को स्पष्ट किया जिसके अधीन पूंजी वस्तुओं का आयात सम्भव है ।

ii. हॉफमैन की व्याख्या के अनुरूप सापेक्षिक रूप से देर में विकास आरम्भ करने वाले देशों में तीव्र संरचनात्मक रूपान्तरण होता है:

विभिन्न देशों में संरचनात्मक रूपान्तरण की सापेक्षिक दरों से सम्बन्धित निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए हॉफमैन की दर काफी महत्वपूर्ण उपकरण साबित होती हैं । हॉफमैन ने विभिन्न देशों के लिए इन दरों को अर्द्धलघुगुणक पैमाने अंकित किया व यह निष्कर्ष दिया कि ऐसे देश जो सापेक्षिक रूप से देर में विकास प्रक्रिया को आरम्भ करते है, संरचनात्मक रूपान्तरण की तीव्र दरों का प्रदर्शन करते है ।

इसका कारण यह है कि वह ऐसी अनुकूल दशा में होते है जिसमें उन्हें विकसित देशों की बेहतर कारगर व उन्नत तकनीक विकसित देशों से प्राप्त हो जाती है । रूस एवं जापान को पश्चिम की उन्नत तकनीक के प्रयोग से ऐसी लाभप्रद दशाएँ प्राप्त हुई ।

iii. देर से आरम्भ करने वाले देशों में पूंजी वस्तु उद्योग मुख्य भूमिका का निर्वाह करते हैं:

औद्योगीकरण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत विलम्ब से प्रारम्भ होने वाले देशों में सापेक्षिक रूप से तीव्र उन्नति होती है । हॉफमैन ने इसे सापेक्षिक रूप से तीन संक्रमण की सहा दी जो औद्योगीकरण की पहली अवस्था से सीधे तीसरी अवस्था में ले जाता है ।

ऐसे देश जहाँ पहले से ही तीव्र वृद्धि हो जाती है वह उपभोक्ता वस्तु उद्योगों में सबसे आगे होते है । विपरीत रूप से, विलम्ब से वृद्धि की प्रक्रिया में संलग्न देशों में पूंजी वस्तु उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते है ।

उदाहरणार्थ इंग्लैण्ड के सूती वस्त्रोद्योग ने औद्योगिक क्रान्ति में अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था परन्तु विलम्ब से वृद्धि प्रक्रिया में संलग्न जर्मनी में, रेलवे उद्योग ने शीर्षस्थ वृद्धि की दरें प्राप्त कीं । ऐसे कुछ देशों में राष्ट्रीय सुरक्षा औद्योगीकरण की उच्चाकांक्षा वाले कार्यक्रमों को अपनाने में मुख्य घटक बनी ।


6. औद्योगिक विकास के आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Appraisal of Industrial Development):

हॉफमैन का विश्लेषण कुछ गम्भीर त्रुटियों के संकेत देता है:

i. हॉफमैन के द्वारा वर्णित दरें कुछ भ्रामक निष्कर्ष की ओर ले जाती हैं:

उपभोक्ता वस्तु उद्योगों एवं पूंजी वस्तु उद्योगों के मध्य की दर के आधार पर अन्तर्देशीय तुलना विकास के अंशों के व्युत्पादन द्वारा सम्भव मानी गई । हॉफमैन ने यह निष्कर्ष दिया कि विकास के अंश के रूप में यूनाइटेड किंग्डम प्रथम, यू॰ एस॰ ए॰ द्वितीय एवं इटली तीसरी अवस्था में आते ।

परन्तु अनुभव सिद्ध प्रमाणों के आधार पर यह सुस्पष्ट तथ्य है कि विकास के अंश के मापन रूप में प्रति व्यक्ति आय आधार पर यू॰ एस॰ ए॰ उच्चतम क्रम में रहा, जबकि यू॰ के॰ इससे कहीं पीछे था ।

ऐतिहासिक समंकों का अवलोकन करते हुए यह पाया जाता है कि कई दशाओं में प्रति व्यक्ति आय एवं उत्पादन या रोजगार का क्षेत्रीय शेयर आर्थिक विकास का सक्षम एवं तर्क संगत सूचक नहीं बनता । ऐसे में इन मापकों के आधार पर विकास के स्तरों का चित्रण ‘विकास के अंश’ की सही पहचान नहीं करा पाता ।

इस कमी को ध्यान में रखते हुए हॉफमैन ने इस दर को विकास के अंश के सूचक के रूप में प्रयुक्त करने में सावधानी बरती । उन्होंने अपने नवीन शोध कार्यों में प्रति व्यक्ति आय के प्रति, इस दर के मूल्यों को वक्र द्वारा निरूपित किया जिससे इन दोनों मापों के मध्य सहसम्बन्ध ज्ञात किया जा सके ।

तब यह पाया गया कि इनके मध्य सम्बन्ध विपरीत प्रकृति का था, क्योंकि सहसम्बन्ध सापेक्षिक रूप से दुर्बल था अर्थात विकास के अंश-मापन के दो उपायों में असंगति विद्यमान थीं । हॉफमैन ने इस असंगति को देशों की भिन्न व्यापार प्रवृतियों एवं संसाधन बहुलताओं के अन्तर द्वारा समझाया ।

ii. औद्योगिक विकास की अवस्थाओं के वर्गीकरण में कमियाँ विद्यमान है । यह वर्गीकरण ऐसी अर्थव्यवस्थाओं को कहीं स्थान नहीं देता जहाँ दर 6:1 से अधिक थी ।

इस कमी को उन्होंने नवीन शोध कार्यों में सुधारा व वर्गीकरण स्कीम को निम्न रूप में प्रस्तुत किया:

(a) पहली अवस्था 2.5/6.5 : 1

(b) दूसरी अवस्था 1.5/2.5 : 1

(c) तीसरी अवस्था 0.5/1.5 : 1

(d) चौथी अवस्था 0.3/0.5 : 1

परन्तु हॉफमैन का उपर्युक्त वर्गीकरण भी तर्क के स्थान पर व्यक्तिगत विचारों एवं अनुभवों पर अधिक आधारित था इसलिये सिद्धान्त एवं योजना की व्याख्या हेतु उनके विशिष्ट चुनाव की स्पष्ट व्याख्या करने में सार्थक सिद्ध नहीं हो पाया ।

iii. कमजोर संकल्पनाएं:

हॉफमैन की धारणाएँ सैद्धान्तिक रूप से दुर्बल सिद्ध हुई । इनमें सैद्धान्तिक रूप से वह आधार काफी कमजोर माना गया जिससे उपभोक्ता वस्तुओं व पूंजीगत वस्तुओं में भेद किया जाता है । वास्तव में इनके मध्य का अन्तर अस्पष्ट होता है जैसे कि वाहन को उपभोक्ता वस्तु भी माना जा सकता है व पूंजी वस्तु भी, जो निर्भर करता है वस्तु के उपयोग की प्रकृति पर ।

iv. यह व्याख्या अनुभव सिद्ध आधार पर दुर्बल है:

हॉफमैन ने सिद्धान्त की पुष्टि हेतु जो समंक एकत्रित किए उनके संकलन की विधि भी दोषपूर्ण ।

v. औद्योगिक विशेषज्ञता एवं एकीकरण पर ध्यान नहीं दिया गया है:

हॉफमैन के विश्लेषण में यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि हॉफमैन की दरों की विश्लेषणात्मक महत्ता क्या है तथा समयावधि विशेष में इसकी प्रवृत्ति क्या होगी ।

हॉफमैन ने यह बात समझाने का प्रयास किया कि पूजी आवश्यकताओं, तकनीकी जटिलताओं एवं उद्योगों के विभिन्न वर्गों में उत्पादों की माँग व लोच में होने वाले परिवर्तनों से उनके द्वारा वर्णित दर के मूल्य में परिवर्तन होता है ।

लेकिन उनका यह स्पष्टीकरण औद्योगिक विशेषता एवं एकीकरण के बदलते संदर्भों में समुचित व्याख्या नहीं कर पाता । विकास के आरम्भिक चरण में उत्पादन अविकसित रूप से अविशेषीकृत फैक्ट्रियों में उत्पादित किया जाता है ।

कच्चे माल के एकत्रीकरण से लेकर उपभोक्ता वस्तु का अन्तिम रूप प्राप्त करने की समूची प्रक्रिया उसी उद्योग द्वारा सम्पन्न की जाती है और अन्य उद्योगों से अदाएँ प्राप्त करने की जरूरत नहीं होती ।

परन्तु जैसे-जैसे बाजार का विस्तार होता है व तकनीकी प्रगति होती है उत्पादन की प्रणाली अधिक जटिल व विशेषीकृत होती जाती है । ऐसी दशा में पूंजी वस्तुएँ व अन्य आदाएँ उन विशिष्टीकरण में दक्ष फर्मों द्वारा प्राप्त की जाती है जो इन वस्तुओं के उत्पादन में दक्ष व कुशल हैं ।

हॉफमैन की व्याख्या को अरमाण्डों लागो ने भ्रान्ति व मिथ्या धारणा कहा, क्योंकि उपभोक्ता एवं उत्पादक वस्तुओं के उत्पादन की मात्रा में होने वाले सापेक्षिक परिवर्तनों की माप करने हेतु यह उचित आधार प्रस्तुत नहीं करती ।

लेकिन लागो ने अपने अध्ययन में यह पाया कि एक समय अवधि में वर्णित हॉफमैन की दर तथा अमेरिका, कनाडा व आस्ट्रेलिया जैसे देशों के काल श्रेणी समंकों जो भारी से हल्के उद्योगों के उत्पादन का अनुपात थे, काफी हद तक समानता रखते थे ।

ठीक ऐसी ही समानता वर्ष 1953 के लिए, अन्तर्राष्ट्रीय अनुप्रस्थ काट ओंकडों में भी पाई गई । इस आधार पर लागो ने सुझाव दिया कि हॉफमैन की दर भारी स हल्के उद्योगों के द्वारा किए गए उत्पादन की बदलती सापेक्षिक महत्ता को प्रदर्शित करता है परन्तु यही बात पूंजीगत व उपभोक्ता वस्तु उद्योग के सन्दर्भ में खरी नहीं उतरती ।