भुगतान संतुलन (बीओपी) – मतलब, मूल्यांकन, घाटा और असाम्य | Read this article in Hindi to learn about:- 1. भुगतान सन्तुलन से अभिप्राय (Meaning of Balance of Payments) 2. भुगतान सन्तुलन का ऐतिहासिक अवलोकन (Historical Evaluation of Balance of Payments) 3. भुगतान सन्तुलन सदैव सन्तुलित रहता है (Balance of Payment Always Balanced) 4. घाटा एवं अतिरेक (Deficit and Surplus) 5. असाम्य (Disequilibrium) and Other Details.

Contents:

  1. भुगतान सन्तुलन से अभिप्राय (Meaning of Balance of Payments)
  2. भुगतान सन्तुलन का ऐतिहासिक अवलोकन (Historical Evaluation of Balance of Payments)
  3. भुगतान सन्तुलन सदैव सन्तुलित रहता है (Balance of Payment Always Balanced)
  4. भुगतान सन्तुलन में घाटा एवं अतिरेक (Deficit and Surplus in Balance of Payments)
  5. भुगतान सन्तुलन में असाम्य (Disequilibrium in Balance of Payments)
  6. आधारभूत असन्तुलन को सुधारने हेतु विनिमय दर समायोजन (Exchange Rate Adjustment to Correct a Fundamental Disequilibrium)

1. भुगतान सन्तुलन से अभिप्राय (Meaning of Balance of Payments):

भुगतान संतुलन एवं नियत समय में किसी देश द्वारा शेष विश्व से हुए लेन-देन का सुव्यवस्थित विवरण है । एक देश द्वारा राष्ट्रीय सीमाओं से पार किये जाने वाले भुगतान एवं प्राप्तियाँ उस देश के भुगतान सन्तुलन खाते में प्रविष्ट किये जाते है ।

किसी देश के भुगतान संतुलन की मदें सामान्यतः वस्तु व सेवाओं के चालू खाते एवं हस्तान्तरण भुगतान व पूँजी खाते द्वारा प्रदर्शिन होती है । चालू खाते के अधीन वाणिज्यिक वस्तुओं के आयात-निर्यात तथा साधन सेवाओं या अदृश्य मदों के लेन-देन सम्मिलित किये जाते है । पूँजी खाते में उल्लिखित प्रविष्टियां ऐसी मदों को समाहित करती है जो किन्हीं देशों के निपटानों में शेष विश्व के सापेक्ष होने वाले परिवर्तनों को प्रकट करें ।


2. भुगतान सन्तुलन का ऐतिहासिक अवलोकन (Historical Evaluation of Balance of Payments):

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संतुलन का विचार अत्यन्त संकीर्ण अर्थों में चौदहवीं शताब्दी में वाणिकवादी विचारधारा द्वारा प्रचलित हुआ । राष्ट्रवाद वणिकवादी विचारों का केन्द्र बिन्दु था । आर्थिक क्षेत्र में व्यापार व वाणिज्य का महत्व बढने लगा था । एक नया वर्ग उत्पन्न हो गया था जिसे व्यापारी कहा जाता था ।

व्यापारी व राजा के हित समान थे । राजा को धन व शक्ति की आवश्यकता केवल अपने लिए नहीं वरन अपनी जनता के कल्याण के लिए भी थी । व्यापार को ही इस उद्देश्य की पूर्ति का एक उत्तम स्रोत माना गया था ।

पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त तक समाज के आर्थिक ढाँचे में काफी महत्वपूर्ण परिवर्तन हो गए थे । घरेलू अर्थव्यवस्था के स्थान पर विनिमय अर्थव्यवस्था को महत्व दिया जाने लगा था ।

विनिमय व व्यापार की प्रगति से मुद्रा की आवश्यकता भी बढी । विज्ञान व तकनीक का निरन्तर विकास हुआ । नई खोज व आविष्कार हुए । जहाजरानी अब अधिक सुविधाजनक हो गई और नए महाद्वीपों की खोज हुई जिससे व्यापार का क्षेत्र विमत हुआ ।

ADVERTISEMENTS:

आर्थिक दृष्टि से व्यापार व वाणिज्य का विस्तार तथा राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए मुद्रा व बहुमूल्य धातुओं पर सर्वाधिक ध्यान दिया गया । वणिकवादियों का यह विश्वास था कि स्वर्ण, चाँदी व अन्य बहुमूल्य धातुएँ प्राप्त करने का एकमात्र साधन विदेश व्यापार ही था ।

वणिकवादी लेखकों ने कहा कि यदि आयात की अपेक्षा निर्यात अधिक होते हैं तो ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राम अपने व्यापार से बहुमूल्य धातुओं का आयात करेगा व इस प्रकार शासन के कोषों में वृद्धि होगी । वणिकवादी लेखक जहाँ तक व्यापार के अनुकूल सन्तुलन का प्रश्न था पर एकमत नहीं थे । कुछ लेखकों का विचार था कि हर व्यक्तिगत सौदे से राष्ट्र को लाभ प्राप्त होना चाहिए ।

वणिकवादी लेखकों में किसी ने इस बात को स्पष्ट नहीं किया कि अनुकूल व्यापार सन्तुलन से उनका आशय सम्पूर्ण व्यापार के सन्तुलन की अनुकूलता से था या वे प्रत्येक देश से होने व्यापार के सन्तुलन की अनुकूलता को अलग-अलग लेते थे । यह कहा गया कि विदेश व्यापार में इस नियम का पालन हर व्यक्ति को करना चाहिए कि हम जो कुछ एक वर्ष में विदेशियों को भेजते है वह उन वस्तुओं के मूल्य से अधिक होना चाहिए जिनको हम उनसे प्राप्त करते है ।

वणिकवादी साहित्य में अनुकूल व्यापार सन्तुलन से सम्बन्धित कुछ अन्य विचार भी महत्वपूर्ण हैं; जैसे निर्यातों का मूल्य अधिक से अधिक होना चाहिए अर्थात् वस्तुओं का निर्यात अधिकाधिक मात्रा में ही नहीं बल्कि ऊंची मूल्य की वस्तुओं के निर्यात को प्राथमिकता मिलनी चाहिए ।

ADVERTISEMENTS:

कच्ची सामग्री के निर्यात को सीमित रखना चाहिए । विलासिता की वस्तुओं का आयात कम होना चाहिए । वणिकवर्ष लेखक व्यापार सन्तुलन की अदृश्य मदों से भी परिचित थे । इन मदों में उन्होंने जहाजों द्वारा माल होने से प्राप्त होने वाली आय, बीमा, विदेशों में दूतावासों तथा सेना पर होने वाला व्यय इत्यादि सम्मिलित किया ।

प्रथम विश्वयुद्ध ने वणिकवादी अनुभवों व नीतियों को नया जीवन प्रदान किया । लगभग सभी देशों जिन्होंने युद्ध में प्रत्यक्ष भाग लिया वहाँ राज्य का पूर्ण नियन्त्रण था । युद्धकाल में व्यक्तिगत, सामाजिक व आर्थिक स्वतन्त्रताओं को स्थगित कर किया गया था ।

इस प्रकार सिद्धान्त व व्यवहार में युद्ध ने राष्ट्रीय संरक्षणवाद को जन्म दिया । यह सब होने के बावजूद भी विभिन्न देशों ने पारस्परिक निर्भरता, वणिकवादी स्वालम्बन शक्ति के आदर्शों व अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के हित में सहयोग की आवश्यकता का अनुभव करते हुए लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना की ।

1927 में लीग ऑफ नेशन्स ने सत्रह देशों के भुगतान सन्तुलन के प्रथम भाग को प्रकाशित किया । लीग ने 1938 में एक उपसमिति की स्थापना की जो भुगतान सन्तुलन की सांख्यिकी को क्रमबद्ध करने व इसकी तकनीक में सुधार के उपाय निर्दिष्ट करती थी ।

दूसरे विश्व युद्ध के आरम्भ होने के कारण यह उपसमिति अपना कार्य पूरा न कर पाई । अतः 1945 में इसकी पुन स्थापना की गई जिसे यूनाइटेड नेशन्स द्वारा 1947 में प्रकाशित किया गया । भुगतान सन्तुलन की विषय-वस्तु पर यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण थी जिसमें क्रियाविधि पर सर्वाधिक ध्यान दिया गया ।

1947 में अन्तर्राष्ट्रीय सहभागिता, विनिमय दरों के प्रबन्ध व भुगतान सन्तुलन की असाम्यावस्था के निवारण हेतु उपयुक्त नीतियों को निर्दिष्ट करने का भार अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने वहन किया । अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने सदस्य देशों की भुगतान सन्तुलन समस्याओं पर गंभीरता पूर्वक विचार किया एवं ऐसी नीतियाँ प्रस्तावित कीं जो सदस्य देशों को समायोजन की अन्य कठोर नीतियों के विकल्प प्रदान करती थीं ।


3. भुगतान सन्तुलन सदैव सन्तुलित रहता है (Balance of Payment Always Balanced):

भुगतान सन्तुलन का लेखा स्टैंडर्ड बहीखाता पद्धति पर आधारित है जिसके अनुसार प्रत्येक सौदे की दोहरी प्रविष्टि की जाती है तथा अन्तर्राष्ट्रीय भुगतान से सम्बन्धित प्रत्येक सौदे का जमा एवं देय दोनों ओर लिखा जाता है । दोहरी प्रविष्टियों पर आधारित भुगतान सन्तुलन लेखे को देखने से स्पष्ट है कि भुगतान सन्तुलन लेखे में जमा व देय दोनों में पूर्ण सन्तुलन रहने के कारण भुगतान सन्तुलन सदैव सन्तुलित रहता है ।

सभी प्रविष्टियाँ ठीक से भरने पर प्रत्येक सौदे की जमा व देय हमेशा बराबर होंगी । इससे अभिप्राय है कि किसी देश की कुल प्राप्तियां आवश्यक रूप से कुल भुगतान के बराबर होती है ।

भुगतान सन्तुलन की मुख्य मदों को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है:

(1) भुगतान सन्तुलन का चालू खाता:

चालू खाते में जमा व देय पक्ष के हस्तान्तरणों या लेन-देन को मुख्यतः दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता:

(i) दृश्य मदें:

जो देश के वस्तु व्यापार अर्थात् वाणिज्यिक व्यापार, यथा खाद्यान्न, कच्चा माल व निर्मित वस्तुओं को समाहित करती है ।

(ii) अदृश्य मदें:

जो सेवाएँ यातायात, ब्याज भुगतान, लाभांश, बैंक चार्ज, बीमा भुगतान, रायल्टी, भेंट, सट्‌टाजनित लाभ व हानि तथा अन्य मदों को सम्मिलित करती हैं ।

मुख्यतः चालू खातों में प्रविष्ट मदें तीन प्रकार की होती है:

(a) वस्तुएं (निर्यात व आयत)

(b) सेवाएं

(c) उपहार तथा भेंट ।

चालू खाते की इन मदों में वस्तुओं का आयात व निर्यात अथवा दृश्य व्यापार सदैव अधिक महत्वपूर्ण होता है । इनमें प्राप्तियों एवं भुगतान के मध्य का अन्तर व्यापार संतुलन कहा जाता है ।

(2) भुगतान संतुलन का पूंजी खाता:

पूंजी के हस्तान्तरण या लेन-देन देश की अन्तर्राष्ट्रीय ऋणग्रस्तता की सेवाओं को बाह्य परिसम्पत्तियों व दायित्वों में होने वाले परिवर्तन के द्वारा प्रभावित करते हैं व इसे देश के पूंजी खाते द्वारा प्रदर्शित किया जाता है । पूंजी खाता ऐसे सभी हस्तान्तरणों को सम्मिलित करता है जो देश की अन्तर्राष्ट्रीय जमा देय दशा में होने वाले परिवर्तनों व इनकी मौद्रिक स्वर्ण जमाओं में होने वाले परिवर्तनों की सूचना देता है ।

पूंजी खाते में सामान्यतः उन मदों को सम्मिलित किया जाता है जिसके द्वारा चालू खाते में प्रविष्ट भुगतान सम्भव होते हैं अर्थात् पूंजी खाते में आयात-निर्यात व सेवाओं की प्राप्तियां व भुगतान की मदें सम्मिलित होती है । इनमें मुख्यतः (i) स्वर्ण का हस्तान्तरण (ii) निजी खातों का शेष भुगतान, (iii) अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से सम्बद्ध भुगतान एवं प्राप्तियां तथा सरकारी खातों का शेष भुगतान सम्मिलित होता है ।

इस अर्थ में कि सभी भुगतान व प्राप्तियाँ समान रहें, भुगतान सन्तुलन में सदैव साम्यता विद्यमान होती है । दूसरे शब्दों में एक देश के सब जमा मिल कर उसके देय के बराबर होने चाहिएँ । इस प्रकार भुगतान सन्तुलन सम्बन्धी विवरण के समस्त धनात्मक (+) एवं ऋणात्मक (-) चिन्ह एक-दूसरे को बराबर करते है व उनका आपसी प्रभाव शून्य होता है ।


4. भुगतान सन्तुलन में घाटा एवं अतिरेक (Deficit and Surplus in Balance of Payments):

भुगतान सन्तुलन में घाटे एवं अतिरेक का विचार नया नहीं है यद्यपि इसकी महत्ता को हाल के ही वर्षों में स्वीकार किया गया है । एक लम्बे समय तक चालू खाते पर सन्तुलन को अतिरेक या घाटे का आधार बनाया गया है ।

भुगतान सन्तुलन में घाटे अथवा अतिरेक हेतु भुगतान सन्तुलन के विशिष्ट वर्ग या खाते के वर्गीकरण को ध्यान में रखा जाता है । उदाहरण हेतु हम तालिका 50.1 की सहायता लेते हैं । भुगतान सन्तुलन में अतिरेक तब होगा जब वाणिज्यिक निर्यातों की वाणिज्यिक आयातों पर अधिकता होगी ।

यदि आयात अधिक व निर्यात कम है तो भुगतान सन्तुलन ऋणात्मक (-) होगा (तालिका में मद-1) चालू खाते के अतिरेक का घाटा वाणिज्यिक एवं सेवाओं के निर्यातों व आयातों की प्राप्तियों एवं भुगतानों के अन्तर द्वारा मापा जायेगा । (देखें मद 1 से 5)

एक पक्षीय हस्तान्तरणों में निजी व सरकारी हस्तान्तरण (मद 6 व 7) तथा राष्ट्र के दीर्घकालीन विदेशी विनियोग (मद 8) में प्रत्यक्ष व पोर्टफोलियो विनियोग सम्मिलित किए जाते हैं ।

सन्तुलनकारी मद के अधीन अल्पकालीन सरकारी पूंजी (मद 9) व स्वर्ण तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय कोषों की गतियों (मद 10) को शामिल किया जाता है । याद सरकारी अल्पकालीन पूंजी, स्वर्ण व अन्तर्राष्ट्रीय कोषों में कोई शुद्ध प्रवाह नहीं होता तो सन्तुलनकारी मदों का योग शून्य होगा ।

यह तब सम्भव होगा जब कुल देय व जमा (मद 1 से 8) एक-दूसरे के बराबर होंगे । इन्हें हम रेखा से ऊपर कहते है । यदि इस रेखा से ऊपर देय व जमा बराबर नहीं है तो सन्तुलन धनात्मक (+) या ऋणात्मक (-) होगा अथवा भुगतान सन्तुलन अतिरेक या घाटे की स्थिति में होता है ।

हस्तान्तरणों की प्रवृति को स्वायत्त तथा समायोजक के रूप में भी स्पष्ट किया जाता है । हस्तान्तरण स्वायत्त तब होगा जब वह वाणिज्यिक प्रेरणा या राजनीतिक विचार विमर्श के प्रत्युत्तर में हो एवं इन्हें भुगतान सन्तुलन में स्वतन्त्र रूप से सम्मिलित किया गया हो । (तालिका में 1 से 8 की मदें स्वायत्त कही जाती है)

समायोजक हस्तान्तरण वह है जो कुल स्वायत्त जमा व देय के अन्तर को पूरा करने के लिए किये जाते हैं । इस प्रकार अन्तराल को पाटने के लिए देश के विदेशी विनिमय अधिकारी द्वारा किए गए हस्तान्तरण (मद 9 व 10) समायोजक प्रकृति के होते हैं ।

भुगतान सन्तुलन व्याख्या में ऐसे हस्तान्तरण जो भूतकाल की किसी निश्चित समय अवधि के अधीन रिकार्ड किए जाते है, सन्तुलनकारी मद को ध्यान में रखते हुए, भुगतान सन्तुलन के अतिरेक या घाटे को सूचित करते हैं । मीड ने इसे भुगतान सन्तुलन का ex-post विवेचन कहा है । इसे वास्तविक सन्तुलन का घाटा अथवा अतिरेक कह कर सम्बोधित किया जाता है ।

फ्रिज मैकलप ने बाजार भुगतान सन्तुलन की व्याख्या की है । उनके अनुसार बाजार भुगतान सन्तुलन के अन्तर्गत अल्पकालीन पूंजी, स्वर्ण तथा अन्तर्राष्ट्रीय कोषों की कोई शुद्ध गतियाँ नहीं होतीं एवं सन्तुलन एक दी हुई समय अवधि में लागू रहता है । प्रो॰ रागनर नकर्से व जे॰ ई॰ मीड ने भुगतान सन्तुलन की ex-ante धारणा की विवेचना की है ।

इनके अनुसार भुगतान सन्तुलन दो दशाओं के अधीन परिभाषित किया जाता है:

(i) अधिकारी सन्तुलन की प्राप्ति की लिए व्यापार व भुगतान पर कोई अतिरिक्त प्रतिबन्ध नहीं लगाते ।

(ii) सन्तुलन की प्राप्ति तब तक नहीं की जा सकती जब तक बिना मुद्रा प्रसार हुए पूर्ण रोजगार प्राप्त नहीं हो जाता ।

जानसन एवं मैकलप ने सन्तुलन की ऐसी परिभाषा दी है जो राजनीतिक निर्णयों को ध्यान में रखती है तथा सन्तुलन बनाए रखने के उद्देश्य हेतु संरक्षण की नीति तथा घरेलू अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार के वांछित स्तर को ध्यान में रखती है । मैकलप ने इसे कार्यक्रम सन्तुलन कहा है ।

फ्रिज मैकलप ने भुगतान सन्तुलन की तीन धारणाओं को स्पष्ट किया:

(1) बाजार सन्तुलन अर्थात् पूर्ति और माँग का सन्तुलन ।

(2) कार्यक्रम संतुलन अर्थात् आशाओं व इच्छाओं का सन्तुलन ।

(3) लेखा सन्तुलन अर्थात् जमा व देय का सन्तुलन ।

बाजार सन्तुलन में घाटा तब होता है जब एक ही दी हुई विनिमय दर पर विदेशी विनिमय की माँग उसकी पूर्ति से अधिक हो ।

लेखा सन्तुलन में घाटा तब होता है जब किसी खाते के देय पक्ष में उसी खाते के जमा पक्ष से अधिक विदेशी विनिमय होता है । बाजार सन्तुलन व कार्यक्रम सन्तुलन का विचार ex-ante है, जबकि लेखा सन्तुलन ex-post विचार है ।


5. भुगतान सन्तुलन में असाम्य (Disequilibrium in Balance of Payments):

कुल प्राप्तियों एवं कुल देयों के मध्य होने वाले अनिवार्य सन्तुलन का कोई विश्लेषणात्मक महत्व है । महत्व तो इस बात का है कि सन्तुलन कैसे प्राप्त होता है ? यदि प्राप्ति और देय के मध्य सन्तुलन रखने के लिए विशाल मात्रा में स्वर्ण का आवागमन हो या विदेश में देश के सचित कीवों की मात्राओं का आहरण करना पड़े या फिर विदेशों व अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से अल्पकालीन या दीर्घकालीन ऋण लेने पड़ें तो सन्तुलन भ्रामक है । ऐसी परिस्थिति यह बतलाती है कि देश की अर्थव्यवस्था में कोई असमायोजना विद्यमान है ।

भुगतान सन्तुलन के असाम्य को मुख्य तीन भागों में बाँटा जाता है:

(1) चक्रीय असन्तुलन

(2) चिरकालिक असन्तुलन

(3) संरचनात्मक असन्तुलन

(1) चक्रीय असन्तुलन:

चक्रीय असन्तुलन व्यापार चक्रों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है । आय व उत्पादन में वृद्धि की दीर्घकालीन प्रवृतियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि इनके अधीन अल्पकालीन तेजी व मन्दी की दशाएँ विद्यमान होती हैं ।

निम्न में से कोई दशा विद्यमान होने पर व्यापार चक्र चक्रीय असन्तुलन को जन्म दे सकता है:

(I) विभिन्न देशों में तेजी व मन्दी की दशाएँ भिन्न-भिन्न होती है ।

(II) विभिन्न देशों में तेजी व मन्दी के समयों में अन्तर होता है ।

(III) विभिन्न देशों में आयातों की माँग की आय लोच भिन्न-भिन्न होती है ।

चक्रीय असन्तुलन की मुख्य विशेषता यह होती है कि सम्पूर्ण व्यापार चक्र के अधीन भुगतान सन्तुलन साम्य में होता है । उदाहरणार्थ अन्य बातों के समान रहने पर, यदि A देश में B देश से गहन व्यापार चक्र हो तो A देश तेजी के काल में घाटा व मन्दी की अवधि में अतिरेक प्राप्त करेगा ।

B देश में इससे ठीक विपरीत दशा होगी । तेजी के समय A देश में B देश की तुलना में आय तेजी से बढ़ेगी । चूँकि A देश में आय तेजी से बढ़ती है अत: A देश के आयातों में तीव्र वृद्धि होगी । B देश में होने वाली आय की वृद्धि कम है अत: B देश के आयात भी सापेक्षिक रूप से धीमी गति से बढ़ेंगे ।

मन्दी के काल में A देश में (B देश से) अधिक तेजी से आय गिरना आरम्भ होगी । अत: A देश के आयातों में (B देश की तुलना में) तेजी से कमी होगी । भुगतान सन्तुलन में चक्रीय असाम्य तब भी उत्पन्न होगा जब विभिन्न देशों में विभिन्न समयों पर व्यापार चक्र की विविध गतियाँ हो रही हों ।

अन्य बातों के समान रहने पर यदि व्यापार चक्र की गतियाँ B देश में A देश से एक वर्ष बाद आ रही हों तो A देश तेजी के समय घाटे की । मन्दी के समय अतिरेक की स्थितियों को प्राप्त करेगा । B देश में A देश की विपरीत दशा देखी जाएगी ।

भुगतान सन्तुलन में चक्रीय असाध्य तब भी उत्पन्न होता है जब आयातों की माँग की आय लोच में भिन्नता देखी जाए । अन्य बातों के समान रहने पर यदि A देश में आयातों की माँग की आय लोच B देश से अधिक हो तो A देश में तेजी के समय घाटे व मन्दी के समय अतिरेक की स्थितियाँ देखी जाएँगी ।

आयातों की माँग की आय लोच उच्च होने के कारण तेजी और मन्दी के समय आयातों में होने वाली वृद्धि व कमी, B देश की तुलना में A देश में अधिक दिखाई देगी ।

चक्रीय असाम्य तब भी उत्पन्न होता है जब विभिन्न देशों में आयातों की माँग की कीमत लोच में भिन्नता दिखाई दे । सामान्यत: तेजी के समय कीमतें बढ़ेगी, मन्दी के समय कीमतें घटेंगी । अन्य बातों के अलावा यदि आयातों के लिए माँग की आय लोच A देश में B देश से अधिक हो तो A देश तेजी के समय अतिरेक तथा मन्दी के समय घाटे का अनुभव करेगा ।

यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि केवल उपर्युक्त स्थितियाँ भुगतान सन्तुलन में असाम्य का कारण नहीं बनती । ऐसी कुछ अन्य दशाएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं जो भुगतान सन्तुलन में चक्रीय असमम्या उत्पन्न करती हैं; जैसे निर्यातों की मांग में होने वाले उच्चावचन, उत्पादन की लोच में पाई जाने स भिन्नताएँ एवं विभिन्न देशों की कीमतों में होने वाले परिवर्तन इत्यादि ।

(2) चिरकालिक संतुलन:

भुगतान संतुलन में चिरकालिक संतुलन तब उत्पन्न होता है जब अर्थव्यवस्था विकास की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करती है । इस प्रक्रिया में कई घटकों, जैसे पूंजी निर्माण, जनसंख्या की वृद्धि, तकनीकी परिवर्तन, बाजारों का विकास, संसाधनों की मात्रा में परिवर्तन होते है ।

विकास की प्रारम्भिक अवस्था में जब अर्थव्यवस्था तीव्र गति से वृद्धि को बढ़ाना चाहती है तब उसे उत्पादन में वृद्धि हेतु घरेलू रूप से संग्रहित बचतों से कहीं अधिक मात्रा में विनियोग की आवश्यकता होती है विकास की इस अवस्था में आयातों की प्रवृति निर्यातों से अधिक रहने की होती है । यदि किसी देश में विदेशी पूंजी का पर्याप्त अर्न्तप्रवाह नहीं हो पा रहा हो तो देश चिरकालिक असन्तुलन का सामना करेगा ।

दूसरी तरफ एक ऐसा देश जहां विकास की दर सापेक्षिक रूप से उच्च हो तो वह देश पर्याप्त मात्रा में बचतों को संग्रहित कर सकता है जिनका समुचित विनियोग किया जाना सम्भव है ।

चूंकि उत्पादकता में वृद्धि हेतु विनियोग की पर्याप्त मात्रा देश में उपलब्ध है अत: उत्पादकता के बढ़ने से निर्यातों में भी वृद्धि होगी । इस प्रकार भुगतान सन्तुलन में साम्यावस्था की प्राप्ति तब होगी जब निर्यातों से अधिक आयात न हो तथा देश में विदेशी ऋणों का अर्न्तप्रवाह न हो ।

सामान्यतः चिरकालिक भुगतान असन्तुलन की व्याख्या देश में बचत व विनियोग की स्थिति के कारण स्पष्ट की जा सकती है । दूसरा महत्वपूर्ण घटक जनसंख्या है । अन्य बातों के समान रहने पर, चिरकालिक भुगतान असन्तुलन जनसंख्या में वृद्धि के कारण भी उत्पन्न होता है ।

देश में जनवृद्धि से आन्तरिक उत्पादन बढ़ता है जिससे आयात माँग बढ सकती है तथा निर्यात का कुछ अंश घरेलू उपभोग माँग से प्रभावित हो सकता है जिससे चिरकालिक असन्तुलन उत्पन्न होता है ।

देश में वृद्धि दर बढ़ाने हेतु जब औद्योगिक क्षेत्र में तीव्र विनियोग किया जाता है तब भी चिरकालिक असन्तुलन उत्पन्न होता है । उत्पादन में वृद्धि की नई तकनीकों की खोज से उत्पादन लागत कम होती है ।

(3) संरचनात्मक असन्तुलन:

भुगतान सन्तुलन में संरचनात्मक असंतुलन तब उत्पन्न होता है जब निर्यातों व आयातों की माँग व पूर्ति दशाओं में संरचनात्मक परिवर्तन है । उदाहरणार्थ हम ऐसी दशाओं को ध्यान में रखते है जिनसे संरचनात्मक असंतुलन उत्पन्न होते है ।

माना किसी देश में निर्यातों की विदेशी माँग में परिवर्तन होता है । यदि A देश की X वस्तु की माँग, विदेशी माँग, रुचि एवं आस्वादों में परिवर्तन के कारण कम हो जाती है तो X वस्तु के उत्पादन में लगे साधन ऐसी किसी दूसरी वस्तु के उत्पादन की ओर लगाए जाएँगे जिसकी विदेशों में माँग की जा रही हो ।

यदि A देश के लिए यह सम्भव न हो कि वह अधिक माँग वाली वस्तु की ओर साधनों का प्रवाह न कर पाए तो A देश संरचनात्मक असन्तुलन की स्थिति का अनुभव करेगा । यह स्थिति तब भी उत्पन्न हो सकती है जब रुचि, फैशन तकनीक आदि में परिवर्तन हो रहा हो ।

संरचनात्मक असंतुलन तब भी उत्पन्न हो सकता है जब पूर्ति में परिवर्तन हो । यदि किसी देश में मानसून ठीक समय पर न आने से फसल बेकार हो जाए एवं यदि वह देश उस फसल का निर्यात करता आ रहा हो तो इससे निर्यात प्रभावित होंगे । यह भी सम्भव है कि देश की आवश्यकता के अनुरूप खाद्यान्न का आयात करना पड़े ।

यदि देश में औद्योगिक अशान्ति, अनशन, हिंसा से औद्योगिक उत्पादन प्रभावित हो व निर्यात कम हो जाएँ तो यह स्थितियाँ भी संरचनात्मक असन्तुलन को जन्म देती हैं । संरचनात्मक असन्तुलन तब भी उत्पन्न हो सकता है जब विदेशों से प्राप्त सेवा आय में कमी हो ।


6. भुगतान सन्तुलन समायोजन (Adjustment of Balance of Payment):

परम्परागत विश्लेषण के आधार पर समायोजन के प्रति उत्तरदायी शक्तियाँ कीमत समता प्रवाह प्रक्रिया द्वारा संचालित होती है । स्वर्णमान के अधीन स्थिर विनिमय दर प्रणाली पर आधारित विवेचन भुगतान सन्तुलन के घाटे व अतिरेक को स्वर्ण के अप्रवाह व बर्हिप्रवाह की स्वचालकता द्वारा समायोजित करता है ।

भुगतान सन्तुलन में घाटा अनुभव कर रहे देश द्वारा स्वर्ण का बर्हिप्रवाह होने पर मौद्रिक पूर्ति संकुचित होती है व कीमत गिरती है । इससे देश के निर्यातों में वृद्धि व आयातों में कमी होती है ।

स्थिर विनिमय दरों पर आश्रित रहते हुए समायोजन की प्रक्रिया स्वचालित रूप से कार्य करती है । जबकि यह संकल्पना ली जाए कि घाटा व अतिरेक प्राप्त कर रहे देश की कीमतों में दृढ़ता नहीं होगी । कीमत परिवर्तनीयता पर आधारित यह सिद्धान्त परम्परागत मौद्रिक विश्लेषण पर आधारित है ।

आधुनिक विश्लेषण में विदेशी व्यापार गुणक द्वारा सन्तुलन दशा को स्पष्ट किया जाता है । निर्यात गुणांक के कार्यशील होने पर निर्यातों व घरेलू आय में वृद्धि होती है । घरेलू आय बढ़ने से आयात बढते है । यदि आयात, निर्यातों से अधिक है तो घरेलू आय का स्तर नीचा रहेगा । इस प्रकार आय में होने वाले परिवर्तनों से समायोजन सम्भव होगा ।

विनिमय दर में परिवर्तन करेन्सी के अवमूल्यन या अधिमूल्यन को प्रकट करता है । अवमूल्यन भुगतान सन्तुलन में समायोजन करने में समर्थ तब होगा जब आयातों की घरेलू एवं विदेशी माँग की लोच इकाई से अधिक हो । यह तब सम्भव है जब पूर्ति पूर्णतया लोचदार हो तथा व्यापार प्रारम्भ में सन्तुलित हो ।

परन्तु जब लोच वांछित स्तर से कम हो तब भुगतान सन्तुलन समायोजन हेतु अवमूल्यन व लोच दशाओं की सार्थकता संदिग्ध बन जाती है । विनिमय दर के परिवर्तन द्वारा भुगतान सन्तुलन समायोजन में यदि घाटे वाले देश की वास्तविक समस्या आय के ऊपर व्यय की अधिकता हो तो ऐसी नीतियों को चुनना आवश्यक होगा जिससे आय के सापेक्ष व्यय कम किए जा सकें । ऐसी स्थिति में मौद्रिक व राजकोषीय नीति का आश्रय लिया जा सकता है ।

मौद्रिक एवं राजकोषीय नीतियों का ऐसा उचित संयोग जिससे बाह्य सन्तुलन प्राप्त हो सके उन दशाओं में सम्भव है जब विनिमय दर स्थायित्व लिए हो व विशेष परिस्थिति में ही विनिमय दर में परिवर्तन संभव हो । विनिमय दर में स्थायित्व लाने की भूमिका अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा सम्पन्न की जाती है ।

विभिन्न विनिमय दर प्रणालियों द्वारा स्वतन्त्र रूप से उच्चावचन करती विनिमय दर, स्वर्णमान एवं अधिकीलित विनिमय दर के अधीन भुगतान सन्तुलन समायोजन की व्याख्या निम्न है:

(i) स्वतंत्र रूप से उच्चावचन करती विनिमय दरों के अधीन भुगतान सन्तुलन समायोजन:

स्वतन्त्र रूप से गति करती विनिमय दरों के अधीन भुगतान सन्तुलन समायोजन निर्यात, आयात एवं अल्पकालीन पूँजीगतियों में होने वाले परिवर्तनों द्वारा सम्भव होता है । व्यापार की मात्रा में होने वाले परिवर्तन निर्यात व आयात की घरेलू एवं विदेशी माँग व पूर्ति की लोच पर निर्भर करते है ।

अल्पकालीन पूँजीगति मुख्यतः ब्याज अर्न्तपणन, सट्‌टा एवं वाणिज्यिक व्यापार की मात्रा से प्रभावित होती है । समायोजन की प्रक्रिया स्वचालित रूप से विनिमय दर में होने वाले उच्चावचन के परिणामस्वरूप सापेक्षिक कीमतों में होने वाले परिवर्तन के प्रत्युत्तर में निर्यात व आयात की मात्रा को प्रभावित करते हैं । संक्षेप में समायोजन की प्रक्रिया अल्पकालीन पूँजीगतियों के साथ व्यापार सन्तुलन के परिवर्तनों द्वारा संचालित होती है ।

स्वरूप रूप से उच्चावचन करती विनिमय दर प्रणाली की क्रियाशीलता यूरोप में 1919 से 1926 तक संदिग्ध मानी गई । यह साख विस्तार पर रोक लगाने में असमर्थ रहने के कारण असफल सिद्ध हुई । अधिकांश सरकारों का दृष्टिकोण इस प्रणाली के प्रतिकूल रहा ।

(ii) स्वर्णमान के अन्तर्गत भुगतान सन्तुलन समायोजन:

स्वर्णमान के अन्तर्गत विनिमय दरें व्यक्तिगत देशों की करेन्सियों की स्वर्ण के रूप में परिभाषित टक समता हो पाती, क्योंकि स्वर्ण के क्रय-विक्रय की हस्तान्तरण लागतों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है ।

विनिमय दरें स्वर्ण निर्यात बिन्दु तथा स्वर्ण आयात बिन्दु पर नियमित रहती है एवं इन दोनों के मध्य की संकुचित सीमा के मध्य उच्चावचन करती है समायोजन की प्रक्रिया में यह माना जाता है कि मजदूरी कीमतें व ब्याज की दर मौद्रिक परिवर्तनों का प्रत्युत्तर देती है ।

जिससे व्यापार सन्तुलन पर प्रभाव पड़ता है । अन्तर्राष्ट्रीय अल्पकालीन पूंजी के प्रवाह तब तक परिवर्तित होंगे जब तक स्वर्ण के प्रवाह रुक न जाएँ व भुगतान सन्तुलन समायोजित न हो जाए ।

(iii) अधिकीलित विनिमय दरों के अन्तर्गत भुगतान संतुलन समायोजन:

वर्तमान की अधिकीलित या नियंत्रित किन्तु समायोजित विनिमय दरें स्वतन्त्र रूप से उच्चावचन करती विनिमय दरों की लोचशील प्रवृति तथा स्वर्णमान प्रणाली की मुख्य विशेषता स्वचालित समायोजन को समन्वित करती है ।

समायोजन की स्वचालकता को भुगतान सन्तुलन से हानि अथवा लाभ प्राप्त कर रहे देशों में अन्तर्राष्ट्रीय कोषों में होने वाले परिवर्तन के प्रत्युत्तर द्वारा मौद्रिक आय व ब्याज की दर में होने वाले परिवर्तन द्वारा प्राप्त किया जाता है ।

विनिमय दरें सापेक्षिक रूप से सीमित सीमाओं पर आधारित अधिकीलित होती हैं ताकि विनिमय दर की अनिश्चितता की दशा में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार व पूँजीगत प्रवाहों की अवरुद्धता को न्यूनतम किया जा सके ।

जब किसी देश के भुगतान सन्तुलन में किसी संरचनात्मक परिवर्तन के कारण आधारभूत असन्तुलन की दशा उत्पन्न हो रही हो तो समायोजन हेतु विनिमय दरों में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के परामर्श द्वारा परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है ।


7. आधारभूत असन्तुलन को सुधारने हेतु विनिमय दर समायोजन (Exchange Rate Adjustment to Correct a Fundamental Disequilibrium):

भुगतान सन्तुलन में असाम्य की प्रवृति मुख्यतः निम्न प्रकार की होती है:

(1) चक्रीय असन्तुलन- जो व्यापार चक्रों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है ।

(2) चिरकालिक असन्तुलन- जब देश विकास की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश कर रहा हो । इस प्रक्रिया में जनसंख्या में होने वाली वृद्धि, बाजार के विस्तार, साधनों की मात्रा में परिवर्तन, तकनीकी सुधार व नवप्रवर्तन की क्रिया एवं पूंजी निर्माण की स्थितियाँ परिवर्तित होती है ।

(3) संरचनात्मक असंतुलन- जोकि निर्यात अथवा आयात या दोनों की माँग व पूर्ति में होने वाले परिवर्तन से प्रभावित होता है ।

(4) अस्थायी असंतुलन- अल्पकालीन प्रवृतियों, यथा बाढ़, सूखा, अकाल, महामारी, युद्ध से उत्पादन होता है ।

(5) स्थायी असंतुलन- इसकी प्रकृति दीर्घकालीन होती है । यदि असन्तुलन के कारणों को दीर्घकाल में परिवर्तित न किया जा सके तो इसे आधारभूत असन्तुलन कहा जाता है ।

यदि असाम्यावस्था क्षणिक या चक्रीय है तो इससे अभिप्राय है कि असन्तुलन को उत्पन्न करने वाली घटनाएँ या तो पुन: उत्पन्न नहीं होंगी या वह स्वयं में प्रतिगामी शक्तियों से सम्बन्धित होंगी । इन परिस्थितियों में भुगतान सन्तुलन में घाटा या अतिरेक उत्पन्न कर रहा देश अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोषों को बफर के रूप में प्रयोग करेगा ।

यदि देश के पास पर्याप्त मात्रा में कोष संग्रहित नहीं हैं तो अन्य विकल्प, जैसे आयात संरक्षण या घरेलू अवस्फीति की नीति को अपनाया जाएगा । सम्भव है कि विकल्प के रूप में वह देश अवमूल्यन की नीति को भी अपनाए ।

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष भुगतान सन्तुलन के असाम्य की अल्पकालिक या अस्थायी कठिनाइयों के निवारण हेतु अतिरिक्त कोष सुलभ करता है व इन देशों को अत्यधिक कटु नीतियों के विकल्प प्रदान करता है । कोष की प्रणाली के अधीन अवमूल्यन की नीति को भुगतान सन्तुलन के आधारभूत सन्तुलन को दूर करने के उपाय के रूप में व्याख्यायित किया जाता है ।

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा स्पष्ट किया गया है कि:

(i) एक सामान्य देश अपनी करेन्सी के समता मूल्य में परिवर्तन को तब प्रस्तावित करेगा जब वह आधारभूत असन्तुलन को सुधारना चाहता है ।

(ii) सदस्य देश की करेन्सी के समता मूल्य में परिवर्तन किया जाना तब सम्भव होगा जब भुगतान सन्तुलन के असाम्य को वहन कर रहा देश करेन्सी के समता मूल्य में परिवर्तन को प्रस्तावित करेगा व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से इस विषय में विचार-विमर्श करेगा ।

(iii) जब एक परिवर्तन प्रस्तावित किया जाता है तब अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष उन विगत परिवर्तनों को ध्यान में रखता है जो सदस्य देश की समता दर में पहले किए गए हैं । प्रारम्भिक समता मूल्य के दस प्रतिशत से अधिक परिवर्तन न होने पर कोष कोई आपत्ति प्रकट नहीं करता ।

यदि प्रारम्भिक समता मूल्य में पुन दस प्रतिशत या इससे अधिक परिवर्तन को प्रस्तावित किया जाये तो अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष इस पर विचार करता है व अपनी राय प्रस्ताव के बहत्तर घण्टे के भीतर व्यक्त कर देता है । इसके अतिरिक्त किसी अन्य दशा में कोष के द्वारा पर्याप्त विचार-विमर्श के उपरान्त राय दी जाती है ।

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष सदस्य देशों को काफी अधिक व प्रतिस्पर्द्धी अवमूल्यनों से सुरक्षित रखता है । 1930 के आस-पास विभिन्न देशों द्वारा बार-बार अवमूल्यन किया गया था जिसका विश्व अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा, जबकि मुद्रा कोष की नीतियाँ जहां तक सम्भव हो अवमूल्यन को टालने का प्रयास करती है । इसके बावजूद भी यह कठिनाई सामने आती है कि मुद्रा कोष के मसविदे में आधारभूत को स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं किया गया है

भुगतान सन्तुलन समायोजन पर कुछ अर्थशास्त्रियों के विचार महत्वपूर्ण हैं । रागनर नर्क्से के अनुसार विनिमय की साम्य दर को परिभाषित करने का सबसे सन्तोषजनक तरीका यह है कि इसे ऐसी दर के रूप में परिभाषित किया जाये जो एक निश्चित समय अवधि के भीतर भुगतान सन्तुलन को साम्य में रखे । अत: विनिमय की असन्तुलित दर से तात्पर्य है कि एक देश अपने अन्तर्राष्ट्रीय कोषों में निरन्तर शुद्ध वृद्धि या ह्रास का अनुभव करता है ।

बर्नस्टीन ने स्पष्ट किया कि कुल विश्व कोषों में होने वाली वृद्धि में एक देश के शेयर या अंश को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए ।

फ्लेमिंग के अनुसार- एक देश अपने भुगतान सन्तुलन के खाते में घाटे का अनुभव तब करेगा, जबकि वह काफी अधिक स्तर पर कोषों का अवक्षय या ह्रास कर रहा हो या इन्हें सीमित मात्रा में प्राप्त कर रहा हो ।

आधारभूत असाध्य की समय अवधि:

अब हम यह स्पष्ट करेंगे कि वह समय अवधि कितनी लम्बी हो जिस पर भुगतान सन्तुलन के असाम्य को आधारभूत कहा जाता है एवं असाम्य का मापन किस प्रकार सम्भव है ?

नर्क्से के अनुसार यदि किसी देश का बाह्म खाता, एक दी हुई विनिमय दर पर पाँच या दस वत्तों की समय अवधि में एकसमान शेष या सन्तुलन का प्रदर्शन कर रहा हो तो विनिमय दर को एक सन्तुलित दर माना जाएगा ।

यह समय अवधि इतनी लम्बी होनी चाहिए कि एक सम्पूर्ण व्यापार चक्र हेतु पर्याप्त हो । ऐसी दशा में, जबकि चक्रीय गतियाँ बहुत अधिक स्पष्ट न हों तो दो या तीन वर्षों की समय अवधि को सामान्यतः उचित माना जा सकता है ।

भुगतान सन्तुलन के असाम्य को एक देश के अन्तर्राष्ट्रीय कोषों में होने वाले शद्ध परिवर्तनों द्वारा मापा जा सकता है । इस सन्दर्भ में सभी अल्पकालीन पूंजीगतियाँ (जो कुछ नीतिगत निर्णयों; जैसे बट्‌टे की दर में होने वाले परिवर्तन के प्रत्युत्तर में होती है) ठीक उसी प्रकार कार्य करती हैं जैसे देश के अन्तर्राष्ट्रीय कोष ।

ऐसी अल्पकालीन पूँजीगतियाँ जो कुछ असामान्य तत्वों; जैसे राजनीतिक स्थिरता व व्यवधानों के कारण हो रही हो, को सन्तुलन निर्धारित करने वाले प्रमाप से अलग रखा जाता है ।

नर्क्से ने इस बात पर जोर दिया कि व्यापार एवं भुगतान पर संरक्षण की नीति को लागू करके या घरेलू अवस्फीति की नीति (जिससे अर्द्धबेकारी उत्पन्न हो) द्वारा भुगतान सन्तुलन के असाम्य को दूर नहीं किया जा सकता ।

बर्नस्टीन ने भुगतान सन्तुलन की समस्याओं को तीन भागों में बाँटा हैं:

(1) चालू मुद्रा प्रसार ।

(2) कीमत एवं लागत असमानता ।

(3) संरचनात्मक कुसमायोजन ।

एक पूर्ण रोजगार अर्थव्यवस्था में यदि समग्र उत्पादन से अधिक समग्र व्यय हो तो भुगतान सन्तुलन में घाटा उत्पन्न होता है अर्थात् घाटा तब होगा, जबकि देश में साख का अधिक विस्तार किया जा रहा हो जिससे मौद्रिक आय व व्यय में वृद्धि होती है व व्यापार सन्तुलन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।

यह प्रभाव बढते आयातों तथा घटते निर्यातों द्वारा मापा जायेगा । देश की वस्तु व सेवाओं की घरेलू माँग व पूर्ति की लोच जितनी अधिक होगी । व्यापार सन्तुलन में उतना ही अधिक घाटा होगा ।

आधारभूत असन्तुलन का आत्मनिष्ठ मापन उस देश के अन्तर्राष्ट्रीय कोषों के व्यवहार द्वारा मापना कठिन नहीं है । यद्यपि असन्तुलन की दशा तब भी विद्यमान हो सकती है जब भुगतान व प्राप्तियाँ सन्तुलन में हों यह तब ही सम्भव होगा जब व्यापार एवं भुगतानों पर प्रतिबन्ध लगा कर या घरेलू अवस्फीति की दशा उत्पन्न कर सन्तुलन प्राप्त किया जा रहा हो ।

आधारभूत असन्तुलन विद्यमान रहने पर यह प्रयास करना होगा कि संरक्षणों को हटाया जा सके व घरेलू अर्थव्यवस्था का विस्तार किया जाए । ऐसी दशा में यह देखना भी आवश्यक है कि कहीं भुगतान सन्तुलन में घाटे की प्रवृति बढ तो नहीं रही है । नीति निर्णय से सम्बन्धित प्रसंग तब ही सार्थक बन पाएँगे जब असन्तुलन के सम्पूर्ण स्रोतों की जानकारी जुटा पाना सम्भव बने ।


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