चाणक्य की जीवनी | Biography of Chanakya in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. जन्म परिचय ।

3. चाणक्य की राज्य सम्बन्धी अवधारणा ।

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4. कौटिल्य का अर्थशास्त्र ।

5. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

भारतीय संस्कृति, इतिहास और राजनीति में चाणक्य का नाम अत्यन्त प्रसिद्ध है । चाणक्य एक व्यावहारिक, राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ कल्याणकारी राज्य के पोषक थे । प्राचीन भारत के राज-शास्त्रियों में चाणक्य का नाम सबसे ऊंचा है । शासनकला तथा कूटनीति के वे प्रतिपादक माने जाते हैं ।

अपने ग्रन्थ ”अर्थशास्त्र” में चाणक्य ने राजदर्शन की जिस अवधारणा को प्रस्तुत किया, वह अद्वितीय है । वे मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के पद प्रदर्शक, गुरु तथा मन्त्री थे । डॉ॰ कुंवर राजेन्द्र सिंह के अनुसार: ”कौटिल्य द्वारा नन्द वंश के विनाश और मौर्य वंश की प्रतिष्ठा से सम्बन्धित कथा विष्णु पुराण में मिलती है ।”

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2. जन्म परिचय:

चाणक्य को कौटिल्य, विष्णुगुप्त तथा कुटिलमति के नाम से भी जाना जाता है । चणक ग्राम में निवास करने के कारण उन्हें चाणक्य और कुटिल गोत्र का होने के कारण उन्हें कौटिल्य कहा गया । उनके पिता कपिल जन्म से ब्राह्मण थे, किन्तु जैन धर्म के वे सच्चे अनुयायी थे ।

जन्म के साथ उनके मुख में दंतपंक्ति देखकर जैन भिक्षुओं ने उन्हें राजत्व का प्रतीक बताया । उनके पिता ने उनकी दंतपंक्तियों को क्षुब्ध होकर तोड़ डाला था । तदुपरान्त जैन भिक्षुओं ने यह भविष्यवाणी की कि यदि यह किसी को सम्राट भी बनायेगा, तो वास्तविक राजसत्ता उसी के हाथ में रहेगी ।

उनकी माता ने भी उनकी दंतपंक्तियों पर लक्ष्मी के  चिह्न अंकित देखकर यह कहा था: “पुत्र राजसत्ता के मोह में तू मुझे न त्याग देना ।” पिता के देहावसान के पश्चात् वे माता के साथ तक्षशिला में जाकर रहने लगे । वहां रहकर विद्याध्ययन करते हुए चाणक्य का विवाह यशोमति नामक कन्या से हो गया था ।

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चाणक्य बहुत ही सादगी और विपन्नता में जीवन व्यतीत करते थे । कहा जाता है कि दरिद्रतावश यशोमति का एक समारोह में उसके गायके वालों ने काफी उपहास उड़ाया था । चाणक्य को जब इस बात का पता चला, तो उन्होंने द्रव्योपार्जन करने का संकल्प ले लिया । इसी ध्येय से वे पाटलीपुत्र पहुंचे ।

चाणक्य राजनीति के प्रकाण्ड पण्डित थे, किन्तु स्वभाव से बहुत उग्र, तीक्षण, दृढ़ प्रतिज्ञ, स्वाभिमानी थे । उनकी कुरूपता के भी कई प्रसंग मिलते हैं । चाणक्य चाहते थे कि भारत से विदेशी यूनानियों को निकाल बाहर करें ।

इसी दौरान चाणक्य का परिचय मगध के अत्याचारी मूर्ख शासक  महापद्मानन्द से हुआ । एक भोज में चाणक्य को जब  महापद्मानन्द से ऊंचा रथान मिला, तो अभिमानी नन्द ने शिखा पकड़कर मुख्यालन ने चाणक्य को उतारकर राजदरबार में घसीटवाया ।

कुपित चाणक्य ने अपनी शिखा खोलकर कहा-जब तक मैं  महापद्मानन्द के वंश का समूल नाश नहीं कर लेता, तब तक अपनी शिखा नहीं बांधूंगा ।” अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए चाणक्य तक्षशिला गये । वहां वे  महापद्मानन्द के सेनापति चन्द्रगुप्त मौर्य से प्रभावित हुए ।

कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त जब छोटा था, तब किसी पहाड़ी पर बैठकर वह अपने दोस्तों के बीच राजा बनकर खेल खेल रहा था तथा अन्यायियों के विरुद्ध निर्णय कर रहा था, जिससे चाणक्य बहुत प्रभावित हुए        थे । वहीं चन्द्रगुप्त मौर्य यद्यपि मुरा दासी का पुत्र था, तथापि वह अत्यन्त प्रतिभाशाली एव वीर था ।

वह भी  महापद्मानन्द के अपमान व अत्याचार का शिकार था । चन्द्रगुप्त के पिता को राजा नन्द ने ही मरवाया था । चाणक्य से भेंट होने पर उसने चाणक्य के साथ मिलकर नन्द साम्राज्य को समूल नष्ट करने की योजना बनायी ।

चाणक्य ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए चन्द्रगुप्त को प्रशिक्षित किया । उसे युद्धकला में भी प्रवीण बनाने के लिए यूनानियों के पास भेजा था । चन्द्रगुप्त और चाणक्य जब उत्तरापथ में भ्रमण कर रहे थे, उस समय सिकन्दर पंजाब के राज्यों पर आक्रमण कर रहा था ।

वे दोनों निरंकुश व स्वेच्छाचारी नन्द एवं सिकन्दर दोनों के शासन का अन्त चाहते थे । अत: उन्होंने पंजाब के समस्त राजाओं को चन्द्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में इकट्‌ठा किया और उनकी सहायता से सिकन्दर को पंजाब से बाहर निकाला । छल-कपट और सैनिक बल से नन्द के वंश का नाश कर अपनी प्रतिज्ञा भी पूरी की ।

मगध राज्य का अधिपति चन्द्रगुप्त मौर्य को बनाया । नन्द वंश के समय मगध राज्य की सीमा उत्तर भारत में सतलज नदी तक थी । चन्द्रगुप्त ने उसे सिन्ध नदी तक कर लिया । इस पर कुपित होकर सिकन्दर के सेनापति सेल्युकस ने भारत पर आक्रमण किया । चन्द्रगुप्त ने चाणक्य की सहायता से सेल्युकस को बुरी तरह से हराकर यूनानियों को सन्धि करने पर मजबूर किया ।

अपनी कूटनीति के तहत चाणक्य ने सेल्युकस की पुत्री हेलेन का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया, ताकि वह दोबारा आक्रमण न कर सके । मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक “इण्डिका” में चाणक्य की जीवनशैली की अत्यन्त प्रशंसा की है ।

3. चाणक्य की राज्य सम्बन्धी अवधारणा:

कौटिल्य राज्य को मानव के लिए अनिवार्य मानते थे । उनकी दृष्टि में राजा को सत्यवादी, उत्साही, कुलीन, धार्मिक, दृढ़, संकल्पी, न्यायशील, विनयशील, प्रजाहितैषी, शीघ्र कार्य करने वाला, युद्धप्रवीण, राज्य का रक्षक, शूरवीर होना चाहिए । राज्य की सुरक्षा के लिए सेना, रक्षा, दुर्ग का प्रबन्ध उसे करना चाहिए ।

शत्रुओं के आक्रमण को चूर-चूर करने वाला तथा राज्य में शान्ति व सुव्यवस्था बनाये रखने वाला होना चाहिए । प्राकृतिक संकटों से राज्य की रक्षा करने के साथ-साथ व्यापार तथा वाणिज्य के क्षेत्र में राज्य की उन्नति करने वाला होना चाहिए । राजा को मन्त्रिपरिषद् का गठन करना चाहिए तथा उसकी सहायता से कार्य करने चाहिए ।

अपने राज्य की सुरक्षा हेतु गुप्तचर अवश्य रखने चाहिए । राज्य का भेद खोलने वालों को सूली पर चढ़ाने तथा देश निकाले का दण्ड देगा चाहिए । राजा को कछुए के समान होना चाहिए । गुप्त बातों को अपने तथा एक दो मन्त्रियों तक ही सीमित रखना चाहिए ।

राजा को गुप्तचर से भेद जानने के लिए धर्मोन्यधा, भयोपधा, कामोपधा, अर्थोपधा रीतियों का प्रयोग करना चाहिए । मन्त्रिपरिषद् में पुरोहित, समाहर्ता, सन्निधाता, दण्डपाल, सेनापति, युद्धमन्त्री, राज्यमन्त्री, कोषागार मन्त्री, मन्त्रिपरिषदाध्यक्ष, मुख्य न्यायाधीश आदि 10 मन्त्री पद रखने चाहिए । मन्त्रियों की योग्यताएं गुप्त परीक्षा के बाद ही निर्धारित करनी चाहिए ।

बिना किसी प्रलोभन में फंसे बिना जो अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करता है तथा शुद्ध चरित्र रखता है, वही मन्त्री पद के योग्य होगा । चाणक्य राजा को राज्य का स्वामी समझाते हैं । यदि राजा अलोकप्रिय, अयोग्य, अदूरदर्शी है, तो उसे पद से हटा देना चाहिए ।

चाणक्य ने 9 प्रकार की गुप्तचर संस्था-कार्पटिक, गृहपतिक, वैदेहिक, उदास्थित, तापस, संत्री, भिक्षुकी, तीक्षण, रसद आदि के द्वारा राज्य सम्बन्धी भेद जानने हेतु नियुक्त किया था । चाणक्य ने अधर्मी, अयोग्य राजा के वध के लिए विषकन्या रूपी संस्था का भी निर्माण किया था ।

चाणक्य ने राजदूतों को उच्च स्थान देते हुए उसे विलासिताविहीन रहकर श्रेष्ठ राजनीतिक चरित्र से युक्त रहने की अपेक्षा की है । राज्य में सुख-शान्ति और न्याय व्यवस्था के लिए चाणक्य ने नियम विरुद्ध कार्य करने वाले तथा अपराधियों के लिए अर्थ दण्ड, कर्म दण्ड और शारीरिक दण्ड का प्रावधान रखा था ।

4. कौटिल्य का अर्थशास्त्र:

कौटिल्य ने अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ “अर्थशास्त्र” 321 और 300 ईसा पूर्व के बीच लिखा था । कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र की परिभाषा देते हुए कहा है कि मनुष्य की वृत्ति अर्थ है और जिस भूमि पर मनुष्य रहते हैं वह भी अर्थ है ।

वह शास्त्र अर्थशास्त्र है, जिसमें मनुष्य भूमि के लाभ, उसके पालन करने के उपाय से सम्बन्धित कार्यो के सम्पादन हेतु उद्योग करता है । अर्थशास्त्र में शासन व्यवस्था का भी वर्णन आता है । इसमें 15 अधिकरण हैं । प्रत्येक अधिकरण कुछ प्रकरणों में विभाजित हैं । प्रथम अधिकरण में राजा के विनय तथा सामान्य व्यवहार का निरूपण है, जिसमें 20 प्रकरण हैं ।

दूसरे प्रकरण में विद्वान पुरुषों की संगति के लाभ का, तीसरे में इन्द्रिय निग्रह का, चौथे में अमात्यों का विवरण, पांचवें में मन्त्री और पुरोहितों का विवेचन, छठे में अमात्यों के हृदय के भावों का छिपकर पता लगाना, सातवें में गुप्तचरों के प्रकार, आठवें में गुप्तचरों के कार्य, ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें में राजपुत्रों से राज्य की रक्षा तथा राजा के कर्तव्य आदि का विश्लेषण किया है ।

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में वर्णाश्रम व्यवस्था को महत्त्व देते हुए उसके प्रति कर्तव्य का पालन करने पर जोर दिया है । कर्तव्य का पालन न करने पर सामाजिक व्यवस्था भंग हो जाती है ।

5. उपसंहार:

चाणक्य व्यावहारिक राजनीतिज्ञ थे । उन्होंने जो सिद्धान्त बनाये, उनका प्रयोग और परीक्षण करके भी देखा । उनकी यह सोच थी कि राजा को अपनी इन्द्रियों पर कड़ा नियन्त्रण रखना चाहिए । राज्य सभी व्यक्तियों को न्याय प्रदान करने के लिए है ।

राजा कुछ बातों में स्वेच्छाचारी हो सकता है, किन्तु निरंकुश नहीं । राजा को सदैव प्रजाहितैषी होना चाहिए । राज्य के हित में गुप्तचर व्यवस्था तथा राजदूत की व्यवस्था चाणक्य की मौलिक देन है, जो आज भी प्रासंगिक है ।

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