झांसी की रानी लक्ष्मीबाई । Biography of Rani Laxmi Bai in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. झांसी की रानी का जीवन चरित्र ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भारत की वह महान् वीरांगना थी, जो वीरता और साहस की प्रतिमूर्ति ही नहीं, अपितु उसका पर्याय थी । भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 की वह प्रमुख नेत्री थी । उसके चरित्र में महान् शासिका होने के सभी गुण मौजूद थे ।

उसकी वीरता और बलिदान की कहानियां बुंदेलखण्ड में आज भी वीरता के भावों के साथ गाई जाती हैं । महान कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान ने तो ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ।’ जीवनी-परक गीत के माध्यम से तो उन्हें अमर बना दिया ।

2. झांसी की रानी का शासनकाल:

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म एक मराठा परिवार में 16 नवम्बर सन् 1834 को काशी में हुआ था । जब उसकी अवस्था 3-4 वर्ष की थी, तो उसकी माता का देहान्त हो गया था । उसका पालन-पोषण उसके पिता मोरोपन्त तांबे ने किया ।

लक्ष्मीबाई के पिता बिठूर में पेशवा बाजीराव के आश्रय में आकर रहते थे । लक्ष्मीबाई को बचपन में मणिकर्णिका, मनु या छबीली भी कहा जाता था । बाजीराव के दत्तक पुत्र नाना साहब, बाला साहब और राव साहब के साथ उसकी शिक्षा-दीक्षा होने लगी । वहीं पर उसने अस्त्र-शस्त्र संचालन और घुड़सवारी की शिक्षा प्राप्त की ।

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लक्ष्मीबाई का विवाह झांसी नरेश गंगाधर राव के साथ कर दिया गया । गंगाधर राव निःसन्तान थे । विवाह के 8 वर्षों बाद लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया था । दुर्भाग्यवश वह 3 माह की आयु में ही चल बसा ।

गंगाधर राव इस मानसिक आघात को झेल नहीं पाये और बीमार रहने लगे । किसी प्रकार का उपचार उनके काम नहीं आया । उनके गिरते हुए स्वास्थ्य को देखकर राज्य की व्यवस्था हेतु 5 वर्षीय दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर उत्तराधिकारी बना दिया गया ।

21 नवम्बर 1853 को लक्ष्मीबाइ विधवा हो चुकी थी । उस समय लार्ड डलहौजी की ”हड़प नीति” चल रही थी । अत: अंग्रेजों के पास दामोदर राव के उत्तराधिकारी होने की सूचना भेजी गयी, ताकि उत्तराधिकारी विहीन राज्य मानकर वे झांसी को हड़प न सके ।

अंग्रेजों ने इस सूचना के बाद भी मेजर एलिस को भेजकर झांसी के खजाने पर ताला जड़ दिया और राज्य का पूरा प्रबन्ध कम्पनी के हाथों सौंपकर 27 फरवरी सन् 1854 में झांसी को एक घोषणा कर अपने राज्य में मिला लिया ।

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रानी ने कहा: ”मैं मर जाऊंगी, पर अपनी झांसी इस तरह नहीं दूंगी ।” अंग्रेजों ने निर्दयतापूर्वक झांसी के खजाने से 6 लाख रुपये दामोदर राव के वयस्क होने तक जमा अपने खजाने में जमा करवा लिये । रानी की पारिवारिक सम्पति और आभूषणों पर भी कब्जा जमा लिया ।

रानी को बस 5,000 की सालाना पेंशन पर नगर के राजमहल में रहने का अधिकार मिला । रानी ने विरोधस्वरूप पेंशन लेने से इनकार कर दिया । उमेशचन्द्र बनर्जी नामक वकील तथा एक अंग्रेज वकील को लंदन भेजा और 60,000 रुपये खर्च कर लंदन में कम्पनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के पास शिकायत पत्र भेजा, जिस पर कोई सुनवाई नहीं हुई ।

अब रानी अपना अधिकांश समय पूजा-पाठ, घुड़सवारी और दामोदर राव की देखभाल में व्यतीत करने लगी । वह मर्दाने वेश में युद्धकला का अभ्यास किया करती थी । 7 वर्ष की अवस्था में दामोदर का यज्ञोपवीत संस्कार करने के लिए उसने 6 लाख रुपये अंग्रेजों से मांगे, जिसे 3 शर्तों पर वयस्क न होने का बहाना बनाकर बमुश्किल दिये ।

1857 की क्रान्ति में भाग लेने के कारण बिठूर के नाना साहब की 8 लाख की वार्षिक पेंशन बन्द कर दी गयी । झांसी तथा अवध जैसे राज्यों को अंग्रेजों ने अधिग्रहण कर लिया था । इस विरोध में 10 मई को मेरठ से क्रान्ति का श्रीगणेश हुआ, तो 4 जून 1857 को कानपुर तथा झांसी में यही विद्रोह युद्ध की घोषणा बन गया ।

झांसी में 2 अंग्रेज अफसर-डनलप और टेलर-को विद्रोही नेता रिसालदार कालेखां और तहसीलदार अहमद हुसैन ने मार डाला, तो 8 जून को अंग्रेजों ने झांसी में आकर निर्दोष स्त्री-पुरुषों तथा कई बच्चों को मौत के घाट उतार डाला तथा रानी के महल को घेर लिया । रानी से खर्च के लिए धन मांगा । रानी के 1 लाख कीमत के बचे-खुचे गहने भी छीन लिये गये ।

अंग्रेजों ने रानी के टीकमगढ़ के दीवान नत्थे खां को रिश्वत देकर अपनी तरफ बड़ी सेना के साथ झांसी आक्रमण हेतु भेजा । रानी तथा उसके सैनिकों ने नत्थे खां की विशाल सेना को धूल चटा दी । अंग्रेजों ने झांसी को उनके हवाले करने का हुक्म दिया । रानी ने खबर भिजवायी:  ”मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी ।”

इसी बीच अंग्रेजी सेना झांसी आक्रमण हेतु आ धमकी थी । रानी ने किले के सारे फाटक बन्द करवा दिये । झांसी के वीर स्त्री-पुरुष व सैनिकों ने इसका डटकर मुकाबला करते हुए अंग्रेजों को खदेड दिया । जब 1857 का गदर हुआ, उससे पूर्व रानी ने अपना कब्जा पूरी तरह से झांसी पर कर लिया था ।

24 मार्च 1858 को बौखलाई अंग्रेज सेना ने ह्यूरोज के नेतृत्व में झांसी पर आक्रमण कर दिया । अंग्रेजों से चले इस युद्ध में किले के प्रवेश द्वार के रक्षक खुदाबक्श तथा तोपची गौस खां शहीद हो गये । 11 हजार की सेना का रानी ने टूटकर मुकाबला किया । अंग्रेजों ने अपनी तोपों की गोलीबारी से किले की दीवार तोड़ दी । रानी के नेतृत्व में स्त्रियों और बच्चों ने भी सहयोग देकर उसकी मरम्मत कर दी ।

रानी ने अपनी सहायता के लिए तात्याटोपे को बुलाया, जो अपनी बड़ी सेना और 28 तोपों की सहायता लेकर रानी के बुलावे पर इहंसी आ पहुंचे । कुछ ही घण्टों में अंग्रेजी सेना भाग निकली । तात्या कालपी चले गये । 1 अप्रैल को पुन: ह्यूरोज ने अचानक तेज हमला कर किले की दीवार की सीढियां तोड़ दीं । रानी के सैनिक, उसकी सखियां झलकारी बाई, मोती बाई, काशी और मुंदर इसमें शहीद रहे ।

तोपों के मोर्चे पर डटी जूही भी वीरगति को प्राप्त हुई । 3 अप्रैल को अंग्रेजों का किले पर अधिकार हो गया । अपनी हार सुनिश्चित जानकर रानी ने दामोदर राव को अपनी पीठ से बांधा और घोड़े पर सवार होकर कालपी भाग निकली । कालपी पर भी अंग्रेजों का अधिकार हो गया था । वहां भी अंग्रेज सेना रानी के पीछे लगी हुई थी । रानी ग्वालियर की तरफ भाग निकली थी ।

दुर्भाग्यवश एक नाले को पार करते समय उसका घोड़ा मर गया । एक अंग्रेज सैनिक ने रानी पर तलवार से ऐसा वार किया कि रानी के चेहरे का आधा भाग कट गया । फिर भी उसने साहस नहीं छोड़ा । एक तलवार की वार से उस सैनिक को मारकर वह गिर पड़ी । रानी के एक विश्वस्त सरदार ने उसे उठाकर बाबा गंगादास की झोंपड़ी में ला छोड़ा ।

बाबा गंगादास के हाथों गंगाजल पीकर रानी ने अपने प्राण त्याग दिये । अगले दिन उसके शव को बड़े से घास के ढेर में रखकर जला दिया गया । वह जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगी । 24 वर्ष की अवस्था में यह महान् वीरांगना अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गयी ।

3. उपसंहार:

रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और साहस की गौरवपूर्ण गाथा युगों-युगों तक भारतवासियों को प्रेरणा देती रहेगी । साहस और वीरता के पर्याय के रूप में यदि किसी नारी की सराहना की जाती है, तो उसे झांसी की रानी की उपमा दी जाती है । रानी लक्ष्मीबाई नारी जाति का गौरव थी ।

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