रानी दुर्गावती । Biography of Rani Durgavati in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. रानी दुर्गावती का जीवन चरित्र ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

ADVERTISEMENTS:

रानी दुर्गावती मातृभूमि की बलिवेदी पर स्वयं का बलिदान करने वाली महान् वीरांगना थी । जिस तरह रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के अत्याचार का वीरतापूर्वक मुकाबला किया था, उसी तरह रानी दुर्गावती ने मुगल शासक अकबर की अधीनता स्वीकार करने की बजाय अपनी मातृभूमि के रक्षार्थ साहसपूवर्क मुकाबला करते हुए अपनी प्राणाहुति दी ।

2. रानी दुर्गायती का जीवन चरित्र:

रानी दुर्गावती का जन्म 400 वर्ष पूर्व हुआ था । दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिराय की पुत्री थी । एकमात्र सन्तान होने के कारण उसके पिता ने उसे पुत्र के समान पाला था । वह शस्त्र चलाने में प्रवीण होने के साथ-साथ सिंह, तेंदुआ जेसे खतरनाक जानवरों का मुकाबला कर लेती थी ।

दुर्गावती का विवाह महोबा के चंदेल राजाओं के वंशज दलपतिशाह से हुआ था । राजा दलपतशाह, दुर्गावती के रूप-गुण की चर्चा सुनकर उससे विवाह करना चाहते थे, किन्तु कीर्तिराय ने पहले जाति की श्रेष्ठता के कारण इसे अस्वीकार कर दिया था ।

विवाह के बाद दुर्गावती राजधानी गढ़मण्डला आकर रहने लगी । 1 वर्ष के भीतर ही 1 पुत्र को जन्म देने के बाद अभी खुशियां ही मनाई जा रही थीं कि तीसरे वर्ष दुर्गावती के जीवन में राजा दलपतशाह की आकस्मिक मृत्यु ने दुःखों का पहाड़ खड़ा कर दिया था । शोक सन्तप्त रानी सती होना चाहती थी, किन्तु उसके छोटे-से पुत्र वीर नारायण का वास्ता देकर उसके शुभचिन्तकों ने उसे रोका ।

ADVERTISEMENTS:

दुर्गावती ने अपने 3 वर्षीय पुत्र वीर नारायण को राजगद्दी पर बैठाया और स्वयं उसकी संरक्षिका बनकर राज-काज चलाने लगी । अपनी योग्यता और परिश्रम से उसने राज्य की कायापलट ही कर दी । उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी । वह अपने पुत्र को आदर्श राजा बनाने के लिए युद्ध-कौशल सिखाने लगी ।

जैसे-जैसे उसके राज्य की समृद्धि और यश वृद्धि होती गयी, वैसे-वैसी उसके पड़ोसी ईर्ष्यालु शत्रुओं ने गोंडवाना राज्य पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन करने का प्रयत्न शुरू कर दिया । सर्वप्रथम तो मालवा के शासक बाज बहादुर ने गढ़मण्डला पर हमला किया । दुर्गावती की कुशल सेना व नेतृत्व में वह मुंह की खाकर भाग निकला ।

रानी ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति और प्रभाव बढ़ाना प्रारम्भ किया । उसने मालवा और बंगाल को अपने अधिकार में कर लिया । अकबर ने गोंडवाना के वैभव को देखकर उसे हथियाने का षड्‌यन्त्र रचना शुरू किया । उसने गुप्तचर भेजकर दुर्गावती के कुछ लालची और स्वार्थी सरदारों को धन और पद का लोभ दिखाकर अपनी ओर कर लिया । अकबर ने एक और षड्‌यन्त्र रचा ।

उसने गढ़मण्डला के स्वामिभक्त और योग्य मन्त्री आधार सिंह को अपने यहां काम पर भेजने के लिए दूत के हाथों एक पत्र रानी दुर्गावती को भेजा । यदि वह उसे नहीं भेजेगी, तो उसके राज्य पर आक्रमण करने का अच्छा बहाना मिल जायेगा ।

ADVERTISEMENTS:

अपने स्वामिभक्त मन्त्री को इस विपत्ति से कैसे बचाये ?  इसी सोच-विचार में थी, तभी आधार सिंह ने कहा: ”मैं आपका विश्वस्त मन्त्री हूं । मैं वहां जाकर उनके षड्‌यन्त्रों और चालों का पता लगाऊंगा ।” रानी दुर्गावती ने उसकी बातों पर विश्वास करके उसे भेज दिया । अकबर ने उसे मन्त्री बनने का लालच दिया । न मानने पर उसे कारागार में बन्द कर दिया ।

अकबर ने आसफ खां को गोंड़वाना पर आक्रमण करने के लिए आदेश दिया । आसफ खां ने एक साथ दो मोर्चो पर आक्रमण करने की योजना बनायी । उसने गोंड़वाना में ऐसे गुप्तचर फैलाये, जो रानी के विरुद्ध प्रचार कर अकबर की महानता, उदारता की प्रशंसा कर रहे थे । कुछ अधिकारियों को तो पद और धन का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया ।

इसमें बदन सिंह नामक सरदार ने रानी दुर्गावती से विश्वासघात किया और अकबर से जा मिला तथा गढ़मण्डला के सारे सैनिक महत्त्व के राज उन पर जाहिर कर दिये । गढ़मण्डला को ध्वस्त करने के लिए अकबर के पास साधन सम्पन्न सेना थी और इधर रानी दुर्गावती के पास अल्प सैन्य-शक्ति व साधन थे ।

रानी दुर्गावती ने भयभीत हुए बिना ही सेना को तैयार किया । उसका पुत्र वीर नारायण भी सैनिकों का उत्साहवर्द्धन कर युद्ध के लिए उन्हें तैयार करता रहा । एक तरफ तो दुर्गावती के पास तोपखाने का अभाव

था । उनके पास तीर-कमान, तलवार, भाले थे ।

दुर्गावती तो बन्दूक से अचूक निशाना साधती थी । जब अकबर की सेना गोंड़वाना के किले के नजदीक पहुंची, उस समय रानी स्वयं घोड़े पर सवार होकर उसका नेतृत्व कर रही थी । दुर्गावती और उसके सैनिकों ने मुगल सेना में घुसकर ऐसी मारकाट मचायी कि आसफ खां अपने कैम्प को कई मील पीछे ले हटा ।

इस पराजय के बाद आसिफ खां बहुत दुखी और शर्मिन्दा हुआ कि अकबर का सेनाध्यक्ष होते हुए भी वह एक स्त्री के हाथों पराजित हुआ । उसने अगली चाल चलते हुए यह कहा कि दुर्गावती अपने पुत्र वीर नारायण को अकबर के संरक्षण में भेज दे, ताकि वह भविष्य में मुगल आक्रमण से बची रहे ।

उसने दूसरे दौर के आक्रमण में दुर्गावती के सैनिकों पर तोप के गोलों की ऐसी बरसात की कि उसके कई सैनिक उसे छाती पर झेलते हुए मर गये । रानी इससे जरा भी नहीं घबरायी और उसने तोप के गोले झेलते हुए सैनिकों को तोपखाने के पास भिजवाकर उसे ही नष्ट कर दिया । आसिफ खां फिर भाग खड़ा हुआ ।

इधर गढ़मण्डला में विजयोत्सव मनाया जा रहा था । उसी समय कुछ भेदियों के साथ मिलकर आसिफ खां ने फिर आक्रमण कर दिया । दुर्गावती ने एक तरफ अपने 16 वर्षीय पुत्र को सेना का संचालन दे दिया, वहीं कुछ बूढ़े सेनाध्यक्षों ने इसे अपना अपमान समझते हुए युद्ध लड़ने से इनकार कर दिया था । इस बीच मुगल सेना किले के फाटक तक आ पहुंची और उन्होंने किले की एक दीवार ढहा दी ।

वीर नारायण लड़ते-लड़ते घोड़े से गिर पड़ा और बुरी तरह घायल हो जाने के कारण वीरगति को प्राप्त हुआ । अपने पुत्र की मृत्यु के बाद रानी ने 300 सवारों को लेकर मुगलों से जोरदार युद्ध किया । कइयों को मौत के घाट उतारा । अचानक एक तीर आकर उसकी आंख में जा लगा । रानी ने उसे अपने ही हाथों से निकालकर बाहर फेंका ।

इतने में दूसरा तीर उसकी गर्दन में जा लगा । रानी असह्य वेदना से छटपटाने लगी । उसने आधार सिंह को आदेश दिया कि वह उसे शत्रुओं के हाथों पड़ने से पहले ही तलवार से मार डाले । आधार सिंह के ऐसा न करने पर दुर्गावती ने स्वयं ही कटार अपनी छाती में घुसा दी ।

उसका निर्जीव शरीर एक तरफ लुढ़क गया । उधर आसिफ खां ने भीषण मारकाट तथा लूट मचाकर गोंड़वाना राज्य की सारी सम्पत्ति लूटकर अधिकांश अपने निजी स्वार्थ के लिए रख ली और 15 हाथियों पर लूट का शेष भाग लदवाकर दिल्ली भेज दिया ।

3. उपसंहार:

रानी दुर्गावती का चरित्र अदम्य साहस, वीरता और सच्ची मातृभूमि प्रेम का पर्याय था । वह चाहती, तो अकबर की अधीनता स्वीकार कर सुख-वैभव और शान्ति का जीवन जी सकती थी, किन्तु उसने स्वाभिमान का जीवन जीना बेहतर समझा ।

Home››Biography››