प्लेटो की जीवनी | Biography of Plato in Hindi!

1. प्रस्तावना ।

2. जीवन चरित्र ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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प्लेटो पाश्चात्य जगत् का प्रथम राजनीतिक दार्शनिक था, जिसने राजनैतिक दर्शन का मानवता के लिए अमर सन्देश दिया था । उसने राज्य को मानव के मन का ही प्रतीक माना था । प्लेटो ने अपने न्याय-सम्बन्धी सिद्धान्त में कहा था कि: ”न्याय मानव आत्मा की उचित अवस्था और मानवीय स्वभाव की प्राकृतिक मांग है । यह समाज की एकता का सूत्र है ।”

प्लेटो ने अपने शिक्षा-दर्शन में शिक्षा को सामाजिक प्रक्रिया मानते हुए उसे मानव में सद्‌गुणों का संचार करने वाली प्रक्रिया माना है । प्लेटो ने साम्यवाद तथा आदर्श राज्य के स्वरूप पर भी अपने आदर्शवादी विचार व्यक्त किये । उसने राज्य के शासक को धनवान्, महत्त्वाकांक्षी और चतुर होने की बजाय बुद्धिमान होने हेतु आवश्यक शर्त बताया ।

2. जीवन चरित्र:

प्लेटो का जन्म एथेन्स के कुलीन परिवार में 428 ई॰पू॰ हुआ था । उसका पिता एरिरट्रोन एथेन्स के अन्तिम सम्राट काडरस का वंशज था । उसकी माता परिक्टियनी सोलन वशज थी । प्रारम्भिक शिक्षा के बाद प्लेटो ने सुकरात के सानिध्य में 8 वर्ष तक अध्ययन किया । प्लेटो का पारिवारिक नाम उतरिस्तोक्लीज था ।

बचपन से उसे संगीत, व्यायाम आदि में अच्छी रुचि थी । उसकी सुन्दर हृष्ट-पुष्ट काया को देखकर उसके व्यायाम शिक्षक ने उसे ‘प्लेटो’ नाम दिया । वह सक्रिय राजनीति में जाने का इच्छुक था, किन्तु 399 ई॰पू॰ में जब सुकरात को जहर दे दिया गया, तो उसके जीवन पर इतना आघात लगा कि उसने दार्शनिक जीवन को अपना लिया ।

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इस तरह मैक्सी ने लिखा है कि: ”प्लेटो में सुकरात पुन: जीवित हो गया ।” सुकरात की मृत्यु के बाद वह एथेन्स के निकटवर्ती नगर मेगरा चला गया । जीवन के 12 वर्ष वह इटली, यूनान, मिश्र यहा तक कि भारत के गंगा तट पर भी घूमता रहा ।

विभिन्न देश तथा उनकी संस्कृति का अध्ययन करने के बाद उसने एथेन्स वापस लौटकर 386 ई॰पू॰ में अपना शिक्षणालय {एकेडमी} खोली । जीवन के 40 वर्ष यहीं बिताये । इस अकादमी में राजनीति, कानून और दर्शन सभी विषयो की शिक्षा की सुविधा थी, किन्तु ज्यामिती, गणित, खगोलशास्त्र तथा भौतिकशास्त्र की शिक्षा के साथ-साथ यहां राजनीतिइा, कानूनवेत्ता तथा दार्शनिक बनने की शिक्षा भी दी जाती थी । 367 ई॰ पू॰ में डायोनिसियस की मृत्यु के बाद उसके पुत्र दियोग को राजनीतिक पथ-प्रदर्शन के लिए प्लेटो की आवश्यकता थी ।

70 वर्ष की अवस्था में प्लेटो ने उसे दार्शनिक सिद्धान्तों के व्यावहारिक रूप की शिक्षा दी, किन्तु कुछ चाटुखोरों ने उनके बीच गम्भीर मतभेद पैदा कर दिये । प्लेटो 366 ई॰ पू॰ एथेन्स लौट आया । प्लेटो ने लगभग 38 गन्धों की रचना की, जिसगें द रिपब्लिक, रटेटसमैन, लीज, फिल्वस, क्रीशस, अपॉलॉजी, मीनो आदि हैं । प्लेटो की ”रिपब्लिक” रचना वास्तव में विद्यालयीन शिक्षा पद्धति का श्रेष्ठतम उदाहरण है ।

इसे राजनीति, नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, कला, दर्शन का समन्वित रूप मानना चाहिए, जिसकी शैली नाटकीय, कवित्व प्रधान तथा कल्पना प्रधान है । प्लेटो ने सद्‌गुण को ही सच्चा ज्ञान माना है । व्यक्ति उघैर राज्य दोनों में सदगुण समान हैं ।

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उन्होंने स्त्रियों और सम्पत्ति के साम्यवाद पर मी विस्तार से लिखा है । जो सत्ता चाहते हैं, उन्हें मूल्य चुकाना होता है । आदर्श राज्य नियन्त्रण के अभाव में निरंकुश और आततायी राज्य के रूप में पूर्तित हो जाता है ।

न्याय को आत्मा के अन्तःकरण की वस्तु मानते हुए उसे व्यक्तिगत, सामाजिक तथा राज्य से सम्बन्धित न्याय के रूप में विभाजित किया है । इन्द्रिय तृष्णा, शौर्य तथा बुद्धि का उचित समन्वय जीवन में न्याय की सृष्टि करता है । न्याय कर्तव्य कर्म है ।

स्वधर्म है । व्यक्तिगत और सामाजिक कर्म है । प्लेटो ने अपनी शिक्षा-पद्धति में प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा को महत्त्व दिया । ”रिपब्लिक” में उसने जनवादी शिक्षा को भी महत्त्व दिया । शिक्षा द्वारा शरीर, मन और आत्मा के विकास के साथ-साथ बालक में सदगुणों की आदतों का विकास होना चाहिए । ”सत्यम शिवम् सुन्दर !” नागरिकता के गुणों को विकास शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए ।

वह संगीत, व्यायाम तथा सैनिक, शिक्षा के पक्ष में था । उसने बालकों को आदर्श मानकर अपनी शिक्षा-सम्बन्धी समस्त योजना प्रस्तुत की । वह शिक्षा में खेल-विधि को महत्त्व देता था । शिक्षा-पद्धति में आदर्श राज्य की कल्पना को उसने विशेष महत्त्व दिया । साम्यवाद तथा सुनियोजित शिक्षा प्रणाली के बिना राज्य विवेकशून्य हो जाता है ।

उसने सम्पत्ति सम्बन्धी मनोविज्ञान, दर्शन, राजनीति के आधार पर प्रस्तुत करने हुआ कहा कि सरकार पर धन का दूषित प्रभाव किसी भी स्थिति में नही होना चाहिए । प्लेटो के साम्यवाद को अरस्तु ने आध्यात्मिक बुराइयों का भौतिक निदान कहा है ।

परिवार विषयक साम्यवाद में उसने अभिभावक तर्ग को पारिवारिक मोह से मुक्त होने को कहा । परिवार के कारण ही राज्य ही एकता और न्याय खतरे में पड़ जाते हैं । पुरुषों की तरह स्त्रियों को भी जीवन क्षेत्र में कार्य करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए, नहीं तो उन; मानसिक शक्ति चूल्हे-चौके में नष्ट हो जाती है ।

वह राष्ट्र के हित नस्ल की सन्तान उत्पन्न करने पर बल देता था । जिस प्रकार मानवीय आत्मा का निर्माण वासना, साहस और विवेक के तीन तत्त्वों से हुआ है भी तरह राज्य को उत्पन्न करने के लिए आर्थिक तत्त्व, सैनिक तत्त्व व दार्शनिक तत्व अत्यावश्यक हैं, जिसमें उत्पादक वर्ग, सैनिक वर्ग व शासक वा हो क हो । राज्य तभी आदर्श स्वरूप ग्रहण कर सकता है, जब शासक निरन्ना, और दार्शनिक हो ।

आदर्श राज्य के मौलिक सिद्धान्त-न्याय, शिक्षा, दार्शनिक राजा का शासन, नर-नारियों के समान अधिकार हैं । “लाज” में उसने आदर्श राज्य की कल्पना करते हुए लोकतन्त्र और राजतन्त्र के मिश्रित संविधान, अनिवार्य तथा सामान्य शिक्षा, न्याय तथा कानून प्रणाली को सर्वोच्च स्थान दिया है । ऐसे महान् शिक्षाशास्त्री, दार्शनिक, न्यायशास्त्री, कानूनवेत्ता प्लेटो अपने पीछे अरस्तु जैसे श्रेष्ठ शिष्यों को छोड़कर संसार से 81 वर्ष की आयु में 347 ई॰ पू॰ चले गये ।

3. उपसंहार:

प्लेटो ने राज्य को सर्वोच्च स्थान प्रदान करते हुए व्यक्ति को गौण माना है । प्लेटो ने न्याय सिद्धान्त को मानव के लिए आवश्यक, उपयोगी बताया है । सुकरात की तरह  सद्गुण ही ज्ञान है, यह कहकर उसने शासक को विवेकी, बुद्धिमान्, दार्शनिक होने हेतु अनिवार्य माना है ।

वह पहला व्यक्ति था, जिसने कानून की प्रभुसत्ता को सर्वोपरि माना । पुरुषों की तरह स्त्रियों को समान अधिकार दिये । राज्य और नैतिकता का शाश्वत चिरंतन सिद्धान्त दिया । नगर और राज्य बुराइयों से तब तक  मुक्त नहीं हो सकते, जब तक शासक दार्शनिक गुणों से सम्पन्न न हो और राज्य के निवासी श्रेष्ठ नागरिक गुणों से परिपूर्ण न हों । वह ऐसे महामानव की खोज गे था, जो राज्य की आदर्शानुरूप सृष्टि करे ।

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