Read this article in Hindi to learn about relations between India and Burma during British rule.

इस युग के राजनीतिक इतिहास की विशेषताएँ (Characteristics of the Political History of this Era):

लार्ड हेस्टिंग्स ने १ जनवरी, १८२३ ई॰ को भारत छोड़ा । उसकी उपलब्धियों के सम्बन्ध में एक समकालीन लेखक प्रिंसेप ने लिखा- “जो संघर्ष इस प्रकार ब्रिटिश प्रभाव की सार्वभौम स्थापना में समाप्त हुआ है, वह विशेष रूप से महत्वपूर्ण और ध्यान के योग्य है, क्योंकि आशा होती है कि यह भारत की देशी शक्तियों से होनेवाले संघर्षों में अंतिम है” किन्तु यह आशावादितापूर्ण भविष्यवाणी पूर्ण रूप में सच नहीं निकली ।

इसमें संदेह नहीं कि १८२३ ई॰ तक भारत का अधिकतर भाग, जो सतलज से ब्रह्मपुत्र तक तथा हिमालय से कन्याकुमारी अंतरीप तक फैला हुआ था, ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया, किन्तु अब तक ब्रिटिश शक्ति जहाँ तक पहुँच चुकी थी उसकी पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं के पार भी ऐसी शक्तियों वर्तमान थीं, जिनके कारनामें मुगलों के लिए महान् चिंता के साधन रह चुके थे तथा जिनकी पराजय नवोदित ब्रिटिश शक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक थी ।

तभी यह दृढ़ और सुरक्षित आधार पर एक अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना कर सकती थी । संक्षेप में, देश की पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं पर बिना प्रभावकारी नियंत्रण रखे एक भारतीय साम्राज्य एक व्यर्थ स्वप्न था ।

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यह सिखों, सिंधियों, उत्तर पश्चिम सीमा की पठान और बलोच जातियों एवं खैबर दरें के पार के अफगानों से तथा ब्रह्मपुत्र के पूर्व बर्मियों और आसामियों से अंग्रेजों के आगे होनेवाले संघर्षों द्वारा सिद्ध हो गया । और भी, नवीन राजनीतिक सत्ता की अभिवृद्धि ने विविध समस्याओं को जन्म दिया ।

यह कुछ वैसों के हितों से जा टकरायी, जो इसके विरुद्ध असंतोष की भावना पालने लगे । कम्पनी की राज्य मिला लेने की नीति ने इसे बढ़ा दिया । फलत: १८५७-१८५९ ई॰ के गदर के रूप में इसका प्रचंड विस्फोट हुआ, जब कि भारत में ब्रिटिश प्रभुता की कठोर परीक्षा ली गयी ।

इस युग में कम्पनी की वैदेशिक नीति को एक नवीन गति मिली । सर अल्फ्रेड लायल कहते है- “ज्यों ही हमारे राज्य का विस्तार हमें विदेशी एशियाई देशों के बहुत ज्यादा नजदीक ले आया, ठेठ भारत की भौगोलिक सीमाओं के पास हमारी शीघ्र पहुँच के कारण हमें नयी उलझनें दीख पड़ी तथा हम अब नयी नस्लों से टक्कर लेने-लेने की हालत में हो गये” ।

अब तक कम्पनी की बाह्य नीति निकट और मध्य पूर्व एवं भारत में फ्रांसीसी परिगोजनाओं और महत्वाकांक्षाओं से प्रभावित हुई थी । फ्रांसीसी संकट नेपोलियन का पतन होने के साथ ही लुप्त हो गया । किन्तु रूस अब फ्रांस की जगह ले बैठा । एशिया में रूस का विस्तार तथा पूर्व में उसके विविध महत्त्वाकांक्षापूर्ण साहसिक काम वाटरलू-उत्तर काल में ईस्ट इंडिया कम्पनी की विदेशी नीति के प्रमुख तत्व सिद्ध हुए ।

पूर्वी सीमा तथा बर्मी युद्ध (Eastern Boundary and Burmese War): 

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(क) प्रथम अंग्रेज-बर्मी-युद्ध:

जब लार्ड हेस्टिंग्स ने भारत छोड़ा, तब कौंसिल के एक सीनियर सदस्य मिस्टर जौन ऐडम ने लार्ड एम्हर्स्ट के आने तक स्थानापन्न गवर्नर-जनरल का काम किया । लार्ड एम्हर्स्ट ने भारत आने पर अगस्त, १८२३ ई॰ में अपना कार्यभार ग्रहण किया । नये गवर-जनरल के शासन-काल की सब से महत्वपूर्ण घटना थी प्रथम अंग्रेज-बर्मी-युद्ध ।

अंग्रेजों का बर्मा से सत्रहवीं सदी से ही व्यापारिक सम्बन्ध चला आता था । आगे चलकर उनके भारतीय राज्य की अभिवृद्धि हुई । इसी समय, अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में, चटगाँव के दक्षिण स्थित अराकान, पेगू और तनासरिम पर एक तिब्बती-चीनी नस्ल का अधिकार स्थापित हो गया ।

इस परिस्थिति के कारण दोनों शक्तियों में उन्नीसवीं सदी में राजनीतिक सम्बन्ध कायम हो गये । करीब १७५० ई॰ में अलोंप्रा नामक एक बर्मी सरदार ने इरावदी के डेल्टा में तैलंगों से पेगू का प्रांत जीत लिया तथा वहाँ एक मजबूत राजतंत्र की स्थापना की । उसके उत्तराधिकारियों ने विभिन्न दिशाओं में राज्य को फैलाया ।

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इनमें बोदौपया, जिसने १७७९ ई॰ से १८१९ ई॰ तक राज्य किया, तथा पागिदोआ, जो उसके बाद ही राजा हुआ, विशेष प्रसिद्ध हैं । बर्मियों ने १७६६ ई॰ में स्याम से तनासरिम छीन लिया । अराकान अब तक एक स्वतंत्र राज्य था, जिस पर उन्होंने १७८४ ई॰ में अधिकार जमा लिया । १८१३ ई॰ में उन्होंने सुर्मा घाटी के समीप मणिपुर को भी जीत लिया ।

कम्पनी के राज्य की पूर्वी सीमा अब तक “अत्यंत अनिर्धारित और अस्थिर” थी । बर्मी इसी ओर बड़े आ रहे थे । अतएव एक अंग्रेजी-बर्मी संघर्ष अवश्यंभावी हो गया । लेकिन कलकत्ता सरकार भारत के दूसरे भागों में गंभीरतापूर्वक उलझी हुई थी । अत: एवं इसने प्रारंभ में बर्मा में दूत भेजकर तात्कालिक अनबन को रोकने की चेष्टा की ।

बर्मा में ये दूत भेजे गये-कैप्टेन साइन्स १७९५ ई॰ में और पुन: १८०२ ई॰ में; कैप्टेन कौक्स १७९७ ई॰ में तथा कैप्टेन कैनिंग १८०३ ई॰ १८०९ ई॰ और १८११ ई॰ में । दूतों के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया गया तथा ये बहिर्प्रेषित दूत-मंडलियाँ असफल सिद्ध हुईं । कुछ लोगों ने बर्मियों द्वारा जीते गये प्रदेशों से भागकर ब्रिटिश सीमा पर शरण ली थी तथा अपने नये युद्ध-स्थान से बर्मी प्रदेशों पर हमले करने लगे थे ।

बर्मियों ने माँगे कीं कि ऐसे भगोड़ों को उनके हवाले कर दिया जाए । कम्पनी की सरकार ने इन माँगों को अस्वीकार कर दिया । इस अस्वीकृति ने पारस्परिक सम्बन्धों को और भी बिगाड़ दिया ।

इस प्रकार जब अंग्रेज पिंडारियों के दबाने में लगे हुए थे, तब आवा के राजा ने लार्ड हेस्टिंग्स के पास एक पत्र भेजा, जिसमें उसने चटगाँव, ढाका, मुर्शिदाबाद और कासिमबाजार के सुपुर्द किये जाने की माँग की, चूँकि मध्यकाल में ये अराकान के राजा को कर देते थे । हेस्टिग्स के इस पत्र के पाने के पहले ही पिंडारी संकट समाप्त हो चुका था । गवर्नर-जनरल ने इसे बर्मी राजा के पास इस टिप्पणी के साथ लौटा दिया कि यह शायद एक जाली पत्र था ।

किन्तु बर्मी सेनापतियों ने शीघ्र आसाम को १८२१-१८२२ ई॰ में जीत लिया । इस प्रकार व उत्तर-पूव में अनिर्धारित ब्रिटिश सीमा के प्रत्यक्ष संपर्क में आ गये । आगे चलकर उन्होंने सितम्बर, १८२३ ई॰ में चटगाँव के समीप स्थित कम्पनी का शाहपुरी द्वीप ले लिया, उस द्वीप से ब्रिटिश चौकियों को दुदपतली भगा दिया तथा बंगाल में कम्पनी के राज्य पर हमला करने की तैयारियाँ करने लगे ।

अंग्रेजों के लिए इसे बर्दाश्त करना बहुत कठिन था । गवर्नर-जनरल लार्ड एम्हर्स्ट ने २४ फरवरी, १८२४ ई॰ को युद्ध की घोषणा कर दी । बर्मियों को अपने देश की प्राकृतिक विशेषताओं में प्रतिरक्षा का सर्वोत्तम साधन उपलब्ध था ।

उनका देश “जंगल और दलदल का एक विस्तृत फैलाव था । वह पर्वत-श्रेणियों एवं इरावदी, सितांग और सालविन की घाटियों द्वारा देशांतर रेखाओं के समानांतर इस प्रकार सजा हुआ था, जैसे फीता लपेटा हुआ हो ।”

और भी, यद्यपि खुली लड़ाई में बर्मी सिपाही प्रशिक्षित ब्रिटिश सैनिकों के लिए समकक्ष के रूप में नगण्य थे, तथापि वे खड़ी खड़ी नुकीली लकड़ियों द्वारा निर्मित बाड़े तुरत तैयार करने तथा “मिट्टी के बने हुए धुस्स फेंकने और लूटने के लिए गड्‌ढे बनाने” में माहिर थे ।

ब्रिटिश योजना रंगून पर समुद्र द्वारा आक्रमण करने की थी । उन्होंने एक आक्रमणकारी सेना भेजी । इसका एरक भाग जनरल सर आर्चिबाल्ड कैपबेल के अधीन था । इसमें ग्यारह हजार आदमी थे, जिनका अधिकांश मद्रास से भर्ती होकर आया था ।

इस आक्रमणकारी सेना के साथ जहाज भी भेजे गये थे जो उपन्यासकार कैप्टेन मैरिअट के अधीन थे । ब्रिटिश सैनिक बर्मियों को आसाम से खदेड़ देने में समर्थ हुए किन्तु बंदुला ने, जो बर्मी सेनापतियों में सब से योग्य था तथा बंगाल पर हमला करने को आगे बढ़ आया था, चटगाँव की सीमा पर रामू में एक ब्रिटिश सैन्यदल को मार मगाया ।

मगर यह रंगून पर ब्रिटिश आक्रमण को नहीं रोक सका । कैपबेल ने ११ मई १८२४ ई॰ को रंगून पर कब्जा कर लिया । आक्रमणकारियों का प्रतिरोध किये बिना ही बर्मी अपने साथ सब तरह की आपूर्तियाँ लेकर पेगू के जंगलों में भाग गये । खाद्य पदार्थों की कमी के कारण ब्रिटिश सैनिक भारी कष्ट में पड़ गये ।

वर्षा के कारण उस स्थान की अस्वास्थ्यकरता ने उनकी कठिनाइयों को और भी बढ़ा दिया । वर्षा ऋतु का अंत होने तक वे भीषण कष्ट में रहे । इसी बीच बंदुला बर्मियों के उद्धार के लिए वापस बुला लिया गया था ।

वह साठ हजार आदमियों के साथ १ दिसम्बर को रंगून के समक्ष पहुँच गया । मगर वह १५ दिसम्बर को हरा दिया गया । भागकर वह दोनाब्यू पहुँचा । वहाँ वह अप्रैल, १८२५ ई॰ के प्रारंभ तक वीरतापूर्वक डटा रहा । इसी समय अकस्मात् गोली लग जाने से उसकी मृत्यु हो गयी ।

यह वस्तुत: बर्मियों के लिए भयंकर हानि थी । कैपबेल ने २५ अप्रैल को लोअर बर्मा की राजधानी प्रोम को जीत लिया तथा वहीं वर्षा ऋतु व्यतीत की । शांति की कुछ असफल वार्ताओं के बाद १८२५ ई॰ के अंत में लड़ाई फिर शुरू हो गयी । ब्रिटिश सैनिकों ने बर्मियों के सारे विरोध को निष्फल कर यांदबू लिए प्रस्थान किया, जो बर्मी राजधानी के साठ मीलों के भीतर था ।

२४ फरवरी, १८२६ ई॰ को बर्मियों ने एक संधि की । इसकी शर्तें कैपबेल ने लिखवायी थीं । इन शर्तों के अनुसार आवा का राजा लडाई के हर्जाने के रूप में एक करोड रुपये देने को विवश हुआ उसे; अराकान और तेनासरिम के प्रांतों से पूर्ण रूप में हाथ धोना पड़ा; बर्मियों को आसाम, कछार और जयंतिया में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने की मनाही हो गयी; उन्होंने मणिपुर को एक स्वतंत्र राज्य मान लिया; “पारस्परिक लाभों के सिद्धांतों पर” एक व्यापारिक संधि होना तय हुआ आवा में एक ब्रिटिश रेजिडेंट स्वीकृत हुआ तथा एक बर्मी दूत को कलकत्ते आने की अनुमति मिली ।

२३ नवम्बर, १८२६ ई॰ को एक व्यापारिक संधि हुई, जो करीब-करीब असंतोषजनक थी । ब्रिटिश रेजिडेंट १८३० ई॰ के पहले स्वीकृत नहीं हुआ । १८३० ई॰ से १८४० ई॰ तक रेजिडेंट का पद क्रमश: मेजर बनी और कर्नल बेंसन द्वारा सुशोभित हुआ । राजा पागीदोआ विषाद-रोग से ग्रस्त हो गया । मई, १८३७ ई॰ में उसे गद्दी से उतार दिया गया और उसके भाई थारावादी को गद्दी दी गयी । मृत्यु पर्यन्त वह कैद में रखा गया ।

इसमें संदेह नहीं कि अंग्रेजों को प्रथम अंग्रेज-बर्मी-युद्ध से महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त हुए । उन्होंने बर्मियों को उनके समुद्र-तट के अधिकांश से वंचित कर दिया तथा आसाम, कछार और मणिपुर एक तरह से उनके संरक्षित राज्य हो गये । किन्तु इससे उनके धन-जन की बड़ी क्षति हुई ।

इसका प्रधान कारण था गवर्नर-जनरल और सेनापति दोनों की अयोग्यता और भूलें । गवर्नर-जनरल औसत योग्यता का व्यक्ति था । वह सबल और स्थिर नीति का अनुसरण नहीं कर सका । सेनापतियों में परिस्थिति की आवश्यकताओं के अनुसार तुरत कार्य का सूत्रपात करने की यथेष्ट योग्यता का अभाव था ।

यदि मद्रास का गवर्नर सर टामस मुनरो ठीक समय पर अतिरिक्त व्यक्ति और खाद्य पदार्थ न भेजता, तो बर्मा में ब्रिटिश सैनिकों को और भी अधिक कष्ट झेलना पड़ता तथा संपूर्ण आक्रमण असफल हो जाता । यह सच है कि अंत में वे हार गये । किन्तु जैसा कि फेर ने स्वीकार किया है, बर्मी सिपाहियों ने “उन परिस्थितियों में लड़ाई की, जिन्होने” उनके लिए “विजय को…असंभव बना दिया” ।

अतएव जिस तरीके से उन्होंने आक्रमणकारियों का वीरतापूर्वक प्रतिरोध करने की चेष्टा की तथा जो दक्षता उन्होंने सड़ी-खड़ी नुकीली लकड़ियों द्वारा निर्मित. बाड़े तैयार करने में प्रदर्शित की, उसके लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं । एक लेखक ने, जो इन बातों में अधिकार रखता है, जोर देकर कहा है कि “यदि अस्थायी दुर्ग-निर्माण की दृष्टि से देखा जाए, तो दोनाब्यू की स्थिति और प्रतिरक्षाएँ सब से वैज्ञानिक इंजिनियर को भी प्रशंसा का भागी बनाती” ।

बर्मा में अंग्रेजों की प्रारंभिक पराजयों और कठिनाइयों से कुछ हलकों में यह विचार वर कर गया कि ब्रिटिश राज्य का विध्वंस समीप है । इसके फलस्वरूप कुछ स्थानों में विद्रोह हुए ।

भरतपुर के राजा मरन पर उसका अल्पवयस्क पुत्र दिल्ली के ब्रिटिश रेजिडेंट सर डेविड आक्टरलोनी की स्वीकृति से वहाँ की गद्दी पर बैठाया गया । उसके चचेरे भाई दुर्जन साल ने इस दावे का विरोध किया । लार्ड एम्हर्स्ट ने पहले तो अहस्तक्षेप की नीति बरती ।

उसने सर डेविड आक्टरलोनी के तलवार के बल पर अपना निर्णय कार्यान्वित करने की चेष्टा करने के काम को नापसन्द किया । इस पर सर डेविड आक्टरलोनी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया । उसके स्थान पर सर चार्ल्स मेटकाफ की नियुक्ति हुई । सर डेविड आक्टरलोनी बूढ़ा आदमी था । उसका स्वास्थ्य खराब रहता था ।

वह शीघ्र मर गया । नये रेजीडेंट सर चार्ल्स मेटकाफ ने, हड़पनेवाले के झूठ दावों के के विरोध के द्वारा, ब्रिटिश सरकार की प्रतिष्ठा की रक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया । वह गवर्नर-जनरल को अपने विचार पर ले आया । अंत में लार्ड कंबरमियर के अधीन एक आक्रमणकारी सेना भेजी गयी ।

जनवरी, १८२६ ई॰ में लार्ड कंबरमियर ने भरतपुर के किले पर धावा बोलकर उसे ले लिया, जिसने १८०५ ई॰ में लॉर्ड लेक के आक्रमणों का प्रतिरोध किया था । दुर्जन साल निर्वासित कर दिया गया । एक दूसरा उल्लेखनीय उपद्रव बैरकपुर के सिपाहियों का विद्रोह था । ब्रिटिश तोपों ने विद्रोही सैन्यदलों पर गोलियाँ चलायीं तथा सैनिक प्रदर्शन का मैदान कमाईखाना बना दिया गया तब जाकर कहीं यह शांत हुआ” ।

(ख) द्वितीय अंग्रेज-बर्मी-युद्ध:

भारत की पूवीं सीमा पर प्रभावकारी ब्रिटिश नियंत्रण की स्थापना के लिए प्रथम अंग्रेज-वर्मी-युद्ध के लाभों के बाद भी कुछ अधिक किया जाना जरूरी था । बर्मा के नये राजा थारावादी (१८३७-१८४५ ई॰) ने यांदबू की संधि को अपने ऊपर लाजिमी समझना कबूल नहीं किया ।

कानूनन उसका काम “बर्मी संविधान के भीतर था, जिसके अनुसार किसी नये राजा के राज्यारोहण पर सभी वर्तमान अधिकार समाप्त हो जाते थे, जब तक कि वह उन्हें संतुष्ट न करे” । किन्तु यह ब्रिटिश हितों के विपरीत था । दूसरे ढंगों से भी ब्रिटिश हित प्रभावित हुए । आवा के दरबार में जो ब्रिटिश रेजिडेंट रहते थे, उनसे शिष्टतापूर्ण बर्ताव नहीं किया जाता था ।

इस कारण अंत में १८४० ई॰ में रेजिडेंट को हटा लेना पड़ा । १८२६ ई॰ की संधि के बाद बर्मा के दक्षिणी समुद्रतट पर ब्रिटिश सौदागर बस गये थे । इन्होंने रंगून के गवर्नर द्वारा अत्याचार किये जाने की शिकायत की । सौदागरों ने कलकत्ता सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहा, जिसमें उनकी शिकायतें दूर हो जाएँ ।

बर्मा का राजा थारावादी अपने पागलपन के कारण नियंत्रण में रख दिया गया । उसका पुत्र पगन (१८४५-१८५२ ई॰) अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ । बर्मा के इस नये राजा के पास लार्ड डलहौजी (१८४८-१८५६ ई॰) ने कोमोडोर लैबर्ट के अधीन एक छोटा रणपोत भेजा ।

इसका उद्देश्य था ब्रिटिश सौदागरों की क्षतियों के लिए हर्जाने की माँग करना तथा रंगन के गवर्नर के हटाये जाने के लिए कहना । यदि गवर्नर-जनरल सचमुच शांतिपूर्ण समझौता चाहता था, तो उसका लक्ष्य एक रणपोताध्यक्ष के भेजने से पूरा नहीं हुआ ।

उसके इम काम को अनावश्यक रूप से क्रोधोत्पादक समझा गया है, जो ठीक ही है । स्वयं डलहौजी ने पीछे कहा कि “ये रणपोताध्यक्ष (कोमोडोर) इस हद तक आग पकड़नेवाले (कंबस्टिब्ल) है कि इनसे समझौते की बातचीत नहीं हो सकती” ।

बर्मा के राजा का झुकाव युद्ध से बचने का था । उसने लैंबर्ट की माँगों का शिष्टतापूर्ण उत्तर दिया, पुराने गवर्नर को हटा दिया तथा शांतिपूर्वक मामला सुलझाने के लिए एक नया अधिकारी भेजा । लैंबर्ट ने नये गवर्नर के पास कुछ पुराने नौविभागीब अधिकरियों का एक शिष्टमंडल भेजा । गवर्नर ने सोये हुए होने का बहाना करके उससे मिलने से इनकार कर दिया ।

इससे ब्रिटिश रणपोताध्यक्ष ने अपमानित महसूस किया । उसने रंगून के बंदरगाह के घेरे की हालत में होने की घोषणा कर दी तथा बर्मी राजा के एक जहाज को पकड़ लिया । इस पर बर्मी तोपश्रेणियों ने ब्रिटिश रणपोत पर गोली चलायी । ब्रिटिश रणपोताध्यक्ष ने भी गोली का जवाब गोली से ही दिया ।

कुछ कागजों से ऐसा मालूम पड़ता है कि लैबर्ट ने गवर्नर-जनरल के आदेशों के विरुद्ध काम किया तथा गवर्नर-जनरल ने उसके उतावलेपन की निंदा की । किन्तु उसने कोमो-डोर के काम को अस्वीकार नहीं किया; बल्कि इसके लिए “जवाबदेही कबूल कर ली” तथा बर्मी सरकार के पास एक अंतिमेत्थम् भेजा, जिसमें उसने १ अप्रैल, १८५२ ई॰ तक एक लाख पौंड क्षतिपूर्ति के रूप में माँगा ।

साथ ही, बर्मियों से शीघ्र होनेवाले संघर्ष के लिए उसकी व्यक्तिगत निगरानी में जोरदार तैयारियाँ होने लगीं, जिससे प्रथम अंग्रेज-बर्मी-युद्ध की भूलों से बचा जा सके । उसके अंतिमेत्थम् का कोई उत्तर नहीं मिला ।

जिस दिन अंतिमेत्थम् की अवधि समाप्त हुई, उसी दिन यानी १ अप्रैल, १८५२ ई॰ को जनरल गौडविन और ऐडमिरल चैन के अधीन ब्रिटिश सेना रंगून पहुँच गयी । जनरल गौडविन प्रथम अंग्रेज-बर्मी-युद्ध का अनुभवी सैनिक था । शीघ्र मर्तबान का पतन हो गया । १४ अप्रैल को रंगून का प्रसिद्ध पगोडा ले लिया गया ।

करीब एक महीने बाद इरावदी डेल्टा के उत्तर-पश्चिम कोने पर स्थित बेसीन पर कब्जा हो गया । डलहौजी सितम्बर में रंगून गया । प्रोम पर अक्टूबर में अधिकार हो गया और पेगू पर नवम्बर में । गवर्नर-जनरल की इच्छा ऊपरी बर्मा में बढ़ने की नहीं थी, किन्तु उसने यह शर्त रखी कि बर्मा का राजा एक औपचारिक संधि द्वारा देश के निचले भाग की विजयों को स्वीकार कर ले । राजा ने ऐसी संधि करने से इनकार किया । तब उसने २० दिसम्बर, १८५२ ई॰ की एक घोषणा द्वारा पेगू या लोअर बर्मा को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया ।

पेगू के मिला लिये जाने से ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की पूर्वी सीमा सालविन के किनारे तक जा पहुँची । ब्रिटिश नियंत्रण बंगाल की खाड़ी के संपूर्ण पूर्वीय समुद्र-तट पर स्थापित हो गया तथा क्षीण हुए बर्मी राज्य के लिए समुद्र का रास्ता बंद हो गया ।

नव-प्राप्त ब्रिटिश प्रांत उत्तर में माइड तक फैल गया, जो प्रोम से पचास मील आगे था । मेजर (पीछे सर) आर्थर फेर इस प्रांत का कमिश्नर नियुक्त हुआ । उसने कैप्टेन (पीछे जनरल) फाइच के सहयोग से वहाँ आवश्यक प्रशासनिक सुधार लाने की चेष्टा की ।