सामाजिक क्रान्ति पर निबंध: अर्थ, परिभाषायें और तत्व | Essay on Social Revolution: Meaning, Definition and Elements in Hindi language.

सामाजिक क्रान्ति पर निबंध | Essay on Social Revolution


Essay Contents:

  1. सामाजिक क्रान्ति का अर्थ (Meaning of Social Revolution)
  2. सामाजिक क्रान्ति की परिभाषायें (Definition of Social Revolution)
  3. सामाजिक क्रान्ति के मूल तत्व (Main Elements of Social Revolution)
  4. सामाजिक क्रान्तियों के प्रकार (Types of Social Revolution)
  5. सामाजिक क्रान्ति की अवस्थायें (Conditions of Social Revolution)
  6. सामाजिक क्रान्तियों के कारण (Causes of Social Revolution)
  7. सामाजिक क्रान्तियों के सामाजिक परिणाम (Social Outcomes of Social Revolution)


Essay # 1. सामाजिक क्रान्ति का अर्थ (Meaning of Social Revolution):

ADVERTISEMENTS:

सामाजिक क्रान्ति के विषय में निम्नलिखित विद्वानों के विचार उल्लेखनीय हैं:

1. ब्रूम-सेल्जनिक- सामाजिक क्रान्ति एक प्रकार की सामूहिक क्रिया है जिसके द्वारा किसी विद्यमान कानूनी व्यवस्था को पलटने का प्रयत्न किया जाता है या पलट दिया जाता है । यह आधारभूत परिवर्तनों की एक माँग है जिसे सीधी कार्यवाही द्वारा प्राप्त किया जाता है ।

2. पीटर काल्वर्ट- सामाजिक क्रान्ति से अभिप्राय ऐसे राजनीतिक परिवर्तन लाने से है जिसके द्वारा जीवन के प्रत्येक पहलू में आकस्मिक परिवर्तन लाया जाता है । प्रक्रिया, घटना, योजना तथा राजनीतिक गाथा इसके प्रमुख तत्व होते है ।

3. मार्क्स-एंजिल्स- उत्पादन सम्बन्धों में जनसंघर्ष के द्वारा ऐतिहासिक परिवर्तन लाना क्रान्ति है ।

ADVERTISEMENTS:

4. सल्वाडोर गिनर- सामाजिक क्रान्ति एक गहन एवं तीव्र सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सामाजिक संरचना में तेजी से व्यापक परिवर्तन लाये जाते हैं या आ जाते हैं ।

5. आर्थर बौर- जो परिवर्तन समाज में बलपूर्वक लाये जाते हैं या जिनके द्वारा सामाजिक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन लाने का प्रयत्न किया जाता है, सामाजिक क्रान्ति कहलाते है ।

6. एडमंड ब्रुर्क- सामाजिक क्रान्ति का सम्बन्ध सामाजिक व्यवस्था से है जिसमें तेजी से परिवर्तन घटित होता है ।

7. अरस्तू- समाज के आधारभूत मूल्यों में परिवर्तन लाना क्रान्ति कहलाता है ।

ADVERTISEMENTS:

8. सोरोकिन- जब किसी सामाजिक व्यवस्था की विद्यमान व्यवस्था अथवा संस्थाओं में तीव्रता, गहनता तथा भयंकर परिवर्तन लाये जाते हैं तब उन परिवर्तनों को हम सामाजिक क्रान्ति कहते हैं ।

9. क्रेन ब्रिटन- सामाजिक क्रान्ति समाज का एक बुखार है जिसके समाप्त हो जाने पर समाज की व्यवस्था स्वस्थ तो हो जाती है लेकिन पूर्ववत् नहीं रहती ।


Essay # 2. सामाजिक क्रान्ति की परिभाषायें (Definition of Social Revolution):

(a) आर्नोल्ड एम. रोज- “सामाजिक क्रान्ति से अभिप्राय किसी समाज में घटित होने वाले आमूल-चूल तथा दूरगामी परिवर्तनों की शृंखला से है, जो प्राय: तेजी से घटित होते है लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि वह हिंसात्मक हों ।”

(b) बिल्बर्ट मूर- सामाजिक क्रान्ति से अभिप्राय समाज के सामाजिक ढाँचे में बड़े पैमाने पर होने वाले अनियमित परिवर्तनों से है । धुर्वीकरण की प्रक्रिया आने वाली क्रान्ति का मुख्य अग्र-सूचक होती है ।

(c) एन्थोनी वैलेस- “यह जान बूझकर संगठित रूप में किया गया एक प्रयास है जो समाज के कुछ सदस्यों द्वारा किन्हीं नवीन विचारों के प्रतिमान को तेजी से ग्रहण करके ऐसी संस्कृति को स्थापित करने के रूप में किया जाता है जो अपेक्षाकृत अधिक सन्तुष्टि प्रदान कर सके ।”

आजकल ”क्रान्ति” शब्द का प्रयोग करना एक फैशन सा हो गया है और इसको इतने ढीले-ढीले अर्थों में प्रयोग किया जाने लगा है कि ”सामाजिक क्रान्ति” की वास्तविक अवधारणा अस्पष्ट होकर रह गई है । एक ओर जहां हम फ्रांस की क्रान्ति की चर्चा करते हैं वहां दूसरी ओर औद्योगिक क्रान्ति, सामाजिक क्रान्ति, धार्मिक क्रान्ति, हरित क्रान्ति, वैचारिक क्रान्ति, रहन-सहन तथा वेषभूषा के दंग में क्रान्ति, फैशन में क्रान्ति इत्यादि की चर्चा करते हैं । वास्तव में सामाजिक क्रान्ति की परिभाषा केवल ऐतिहासिक रूप में ही की जानी चाहिए तथा इसमें मुख्य रूप से राजनीतिक पहलू की प्रधानता होनी चाहिए ।

ऐतिहासिक रूप में विचार करने पर फ्रांस की 1789 की क्रान्ति के बाद से आधुनिक क्रान्ति के युग का इतिहास शुरू होता है । आधुनिक काल में हम रूस, चीन, इंग्लैण्ड, फ्रांस, अमेरिका, क्यूबा, वीयतनाम, अफ्रिकाई देशों, एशियाई देशों, कोरिया, इत्यादि में हुई राजनीतिक क्रांतियों का उल्लेख कर सकते है ।


Essay # 3. सामाजिक क्रान्ति के मूल तत्व (Main Elements of Social Revolution):

(I) इसमें सामाजिक परिवर्तन होते है ।

(II) इसमें परिवर्तन राजनीतिक व्यवस्था में आते है जिनके परिणामस्वरूप एक विद्यमान राजनीतिक व्यवस्था के स्थान पर दूसरी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हो जाती है ।

(III) इसमें परिवर्तन धीरे-धीरे नहीं आते बल्कि अचानक, तेजी से तथा तीव्रता से आते हैं ।

(IV) इन परिवर्तनों से न केवल राजनीतिक ढाँचा ही प्रभावित होता है बल्कि सामाजिक संस्थायें तथा इनसे सम्बन्धित मूल्य-व्यवस्था भी प्रभावित होती है ।

(V) इनसे महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी घटित होते हैं, यहाँ तक कि कालान्तर में सामाजिक चरित्र की प्रकृति में ही अन्तर आ जाते हैं ।

(VI) ये परिवर्तन सम्पूर्ण सामाजिक संरचना में परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं, जिसमें राजनीतिक एवं मनोवैज्ञानिक व्यवस्थायें भी सम्मिलित होती हैं । ये परिवर्तन साधारण न होकर व्यापक तथा आमूल-चूल आकार के होते है ।

(VII) परिवर्तन लाने की विधि में बल तथा हिंसा का प्रयोग भी किया जाता है जिसमें अनेक प्रकार से जान-माल की हानि तथा रक्तपात भी सम्मिलित है ।

इस प्रकार सामाजिक क्रान्ति एक ऐसा राजनीतिक परिवर्तन है जिसमें सम्पूर्ण सामाजिक संरचना अचानक, तेजी एवं तीव्रता से आमूल-चूल रूप से परिवर्तित हो जाती है जिसमें आवश्यकतानुसार बल तथा हिंसा का प्रयोग भी होता है ।


Essay # 4. सामाजिक क्रान्तियों के प्रकार (Types of Social Revolution):

सारोकिन ने निम्नलिखित छ: प्रकार की क्रान्तियों की चर्चा की है:

(i) राजनीतिक क्रान्ति:

जब कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन विशेष रूप से केवल किसी समूह की राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध होता है, जिसमें राजप्रसादों में होने वाली क्रान्तियों से लेकर शासक वर्ग तथा सरकार में तीव्र परिवर्तन सम्मिलित किया जाता है, तब ऐसे परिवर्तनों को ”राजनीतिक क्रान्ति” की संज्ञा दी जाती है ।

(ii) आर्थिक क्रान्ति:

जब कोई क्रान्तिकारी आन्दोलन किसी समूह की आर्थिक व्यवस्था सम्पत्ति के स्वरूप तथा स्वामित्व, उत्पादन, वितरण तथा उपभोग में तीव्र परिवर्तन लाने का प्रयास करता है तब उसे “आर्थिक क्रान्ति” कहा जाता है ।

(iii) धार्मिक क्रान्ति:

जब किसी क्रान्तिकारी आन्दोलन द्वारा समूह के धार्मिक मूल्यों में तीव्र परितर्वन लाये जाते है तब इन्हें ”धार्मिक क्रान्ति” कहा जाता है ।

(iv) पारिवारिक क्रान्ति:

जब किसी समूह की पारिवारिक तथा वैवाहिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की चेष्टा की जाती है तब इन्हें ”पारिवारिक क्रान्ति” कहा जाता है ।

(v) प्रजातीय या राष्ट्रवादी क्रान्ति:

जिन संस्थाओं सम्बन्धों तथा मूल्यों को बदलने की कोशिश की जाती है यदि वे प्रजातीय अथवा राष्ट्रीय हों तब ऐसी क्रान्तियों को प्रजातीय या राष्ट्रवादी क्रान्ति कहा जाता है ।

(vi) सम्पूर्ण क्रान्ति:

जब सम्पूर्ण स्थापित कानून, समूह की समस्त संस्थाओं एवं मूल-अवस्था में परिवर्तन लाने का प्रयत्न किया जाता है तब उन्हें ”सम्पूर्ण क्रान्ति” कहा जाता है ।

इनके अतिरिक्त इन निम्न प्रकार की क्रान्तियों की चर्चा भी हम कर सकते हैं:

(a) प्रतिक्रान्ति:

म्यूजल ने प्रतिक्रांति की चर्चा करते हुए बतलाया है कि क्रांति के काल में उच्च वर्ग को हटाकर एक नवीन वर्ग सत्तारूढ़ हो जाता है । परन्तु जब यह उच्च वर्ग पुन: क्रान्ति करके सफलता प्राप्त कर लेता है, अपनी पहले की सत्ता स्थिति को प्राप्त कर लेता है, तथा क्रान्ति काल में घटित होने वाले सभी परिवर्तनों को पलट देता है, तब इस प्रकार की घटना प्रतिक्रान्ति कहलाती है ।

(b) वाममार्गी, दक्षिणमार्गी तथा मध्यमार्गी क्रांतियाँ:

एस. एम. लिप्सेट ने क्रान्तियों के मुख्य रूप से तीन प्रकारों की चर्चा की है-वाममार्गी, दक्षिणमार्गी तथा मध्यमार्गी । इस प्रकार साम्यवाद तथा पैरोवाद प्रकार की क्रान्तियाँ वाममार्गी क्रान्तियाँ हैं जिनमें एक सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था के स्थान पर दूसरी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित कर दी जाती है ।

परम्परागत सत्तावाद प्रकार की क्रान्ति दक्षिणमार्गी होती है जिसमें विद्यमान व्यवस्था में ही आवश्यक संशोधन अथवा सुधार करके उभरती हुई मांगों की सन्तुष्टि के योग्य बनाया जाता है । फासिस्टवाद प्रकार की क्रान्ति मध्यमार्गी क्रान्ति कहलाती है । जिसमें एक ओर वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग की जाती है और दूसरी ओर स्थापित सत्ता को बनाये रखने का प्रयत्न किया जाता है ।

(c) उदारवादी तथा उग्र क्रान्तियाँ:

दक्षिणमार्गी तथा वाममार्गी क्रान्तियों को कुछ विद्वान उदारवादी तथा उग्रवादी क्रान्तियों की संज्ञा भी देते हैं । दक्षिण मार्गी प्रकार की क्रान्ति को उदारवादी क्रान्ति इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस प्रकार की क्रान्ति का उद्देश्य वर्तमान राजनीतिक अथवा सामाजिक व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना नहीं होता ।

इस प्रकार की क्रान्ति में पहले विद्यमान राजनीतिक व्यवस्था में जो दोष उत्पन्न हो जाते है अथवा इसके नेता जिस प्रकार की नीतियों का अनुसरण करते है उनसे असन्तोष दूर करने के लिए क्रान्ति के नेता एक ऐसा सामूहिक प्रयास करते हैं जिसमें प्रचलित नीतियों अथवा विद्यमान राजनीतिक व्यवस्था में आवश्यक संशोधन, परिवर्तन या सुधार करने के लिए सत्तारूढ़ नेताओं को विवश किया जाता है तथा उन संशोधनों को प्रभावोत्पादक ढंग से क्रियान्वित करवाया जाता है ।

इस प्रकार की क्रान्ति के नेता एक विरोधी दल या ‘दबाव समूह’ के रूप में काम करते हैं । अनेक प्रजातांत्रिक देशों में इस प्रकार का उदारवादी समूह सदैव विद्यमान रहता है । यह समूह जब सत्ता प्राप्त कर लेता है तब भी यह विद्यमान व्यवस्था को बिलकुल उखाड़ कर नहीं फेंक देता बल्कि उसमें अपनी नीतियों के अनुसार आवश्यक हेर-फेर कर देता है ।

इसके विपरीत वाममार्गी क्रान्ति को उग्रवादी क्रान्ति इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके नेता यह विश्वास करते हैं कि समाज में जो व्यापक असन्तोष विद्यमान है उसको केवल वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन करके और उसके स्थान पर एक नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करके ही दूर किया जा सकता है ।

उग्रवादी नेता अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हिंसात्मक कार्यवाहियाँ करने में संकोच नहीं करते बल्कि सम्पूर्ण क्रान्ति के काल में अनेक बार हिंसा का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि उदारवादी नीतियों के द्वारा उद्देश्य की पूर्ति असम्भव सी प्रतीत होती है । उदारवादी हिंसात्मक नीतियों में विश्वास नहीं करते, वे शांति एवं समझौते तथा दबाव की यांत्रिकी अपनाते है ।

(d) सांस्कृतिक क्रान्ति:

1950-1960 के दशक में चीन में एक नये प्रकार की क्रान्ति का सूत्रपात हुआ जो सांस्कृतिक क्रान्ति के नाम से जानी जाती है । इस क्रान्ति का उद्देश्य उन सभी तत्वों को जड़ से उखाड़ कर फेंकना था जो साम्यवादी संरचना के विरुद्ध उत्पन्न हो गये ।


Essay # 5. सामाजिक क्रान्ति की अवस्थायें (Conditions of Social Revolution):

क्रेन ब्रिटन ने फ्रांस, अमेरिका, इंग्लैंड तथा रूस की क्रान्तियों का तुलनात्मक अध्ययन करके इनके विकास की निम्नलिखित अवस्थाएं बताई हैं:

i. प्रथम अवस्था:

आर्थिक दृष्टि से उपरोक्त चारों देश क्रांति से पहले अच्छी स्थिति में थे । यहाँ क्रान्तियाँ उन असमृद्धशाली व्यक्तियों ने नहीं की जो अपने को नियंत्रण में बंधा या असन्तुष्ट या असहाय समझते थे, बल्कि क्रान्तियाँ शासकों की भयंकर दमनकारी नीति के कारण उत्पन्न हुई । इन क्रान्तियों में भाग लेने वाले भूखे-नंगे, दलित लोग नहीं थे, ये निराश व्यक्ति भी नहीं थे । ये क्रान्तियाँ तो आशा की लहर से उत्पन्न हुईं और इनका दर्शन आशावादी था ।

ii. दूसरी अवस्था:

क्रांति से पूर्व के इन समाजों में निश्चित रूप से तीव्र वर्ग का विरोध विद्यमान था । यह प्रतिरोध 1640, 1776 तथा 1789 की क्रान्तियों में सामनावादियों का बुर्जुओं के प्रति, या 1917 की क्रांति में बुर्जुओं का श्रमिकों के प्रति नहीं था ।

क्रान्ति की तीव्र भावना उन पुरुषों और स्त्रियों के मन में उपजी जिनके पास जीवन-निर्वाह के लिये पर्याप्त धन था और जिन्होंने सामाजिक रूप से सुविधा-सम्पन्न कुलीनतंत्र की असमानताओं पर गहन चिन्तन किया था । क्रान्तियाँ उस समय अधिक सम्भव होती है जब सामाजिक वर्ग एक दूसरे से अधिक दूर होने की अपेक्षा काफी निकट होते है ।

अस्पृश्य व्यक्ति कदाचित ही ईश्वरीय कुलीनतत्र के विरुद्ध विद्रोह करते हैं । परन्तु धनिक व्यापारियों की पुत्रियाँ जिनके विवाह कुलीनों से हो सकते हैं यह सोचने की स्थिति में अधिक होती हैं कि ईश्वर के लिये तो व्यापारी तथा कुलीन एक समान ही है ।

यह कहना कठिन है कि सामाजिक रूप से जो वर्ग लगभग समान होते हैं उनमें कुछ समाजों में दूसरों की अपेक्षा क्रांति के भाव इतनी तीव्रता में क्यों उत्पन्न होते है । सामान्य रूप से यह देखने में आया है कि क्रान्तिपूर्व के समाजों में इस प्रकार के वर्ग-प्रतिरोध तीव्र रूप में विद्यमान थे ।

iii. तीसरी अवस्था:

सभी समाजों की क्रान्तियों में एक सामान्य तत्व बुद्धिजीवियों का अलगाव देखा गया ।

iv. चौथी अवस्था:

उपरोक्त सभी समाजों में क्रान्ति पूर्व काल में यह देखा गया कि सरकारी व्यवस्था स्पष्ट रूप से अकुशल थी, जिसका कारण आशिक रूप में लापरवाही था तथा आशिक रूप में पुरानी संस्थाओं में आवश्यक परिवर्तन न करना था ।

इन सभी समाजों में यह देखा गया कि आर्थिक विस्तार तथा विकास की नई दशाओं नये धनिक वर्गों के प्रादुर्भाव, यातायात के नवीन साधनों के विकास व्यापार की नई पद्धतियों इत्यादि नवीन दशाओं ने एक ऐसा दवाब डाला जिसको साधारण अपेक्षाकृत आदिम दशाओं में अनुकूलित सरकारी व्यवस्था सहन न कर सकी ।

v. पाँचवीं अवस्था:

पहले से जो शासक वर्ग चला आ रहा था उस शासक वर्ग के अनेक व्यक्ति स्वयं अपने पर विश्वास खो बैठे अथवा अपने वर्ग की प्रथाओं तथा परम्पराओं में आस्था खो बैठे, तथा बुद्धिजीवियों के रूप में विकसित हो गये या उन्होंने मानवीय दृष्टिकोण अपना लिया या स्वयं विरोधी वर्गों में जाकर मिल गए । इनमें से अधिकांश व्यक्ति अनैतिक जीवन व्यतीत करते थे । दूसरे शब्दों में शासक वर्ग राजनीतिक रूप से बिल्कुल निरर्थक एवं अयोग्य हो गया था ।


Essay # 6. सामाजिक क्रान्तियों के कारण (Causes of Social Revolution):

सामाजिक क्रान्तियों के सिद्धान्तों ने क्रान्तियों के सामाजिक कारणों का जो विश्लेषण किया है । उसमें तीन कारणों पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है:

(1) शक्ति पतन

(2) नेताओं का व्यवहार तथा

(3) आकस्मिक घटना

तकावली तथा मार्क्स के विचारों का सम्मिश्रण करके जेठ, डेविस ने सामाजिक क्रान्ति होने के लिए निम्न सैद्धान्तिक प्रतिस्थापना व्यक्त की है । “क्रान्तियाँ होने की सम्भावना उस समय अधिक होती है जब एक लम्बी अवधि के स्पष्ट आर्थिक एवं सामाजिक विकास के बाद एक छोटी सी अवधि आती है जिसमें तीव्र विपरीत प्रक्रिया दृष्टिगोचर होती है ।

पहले की स्थिति में समाज के व्यक्तियों में यह विश्वास उत्पन्न हो जाता था कि उनमें अपनी बढ़ती हुई आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने की योग्यता है; लेकिन बाद की स्थिति में वे मानसिक चिन्ता एवं निराशा का अनुभव करने लगते है कि वास्तविकता वह नहीं है जो स्पष्ट दिखती है । यह स्थिति क्रान्तियों को उत्पन्न करती है ।”


Essay # 7. सामाजिक क्रान्तियों के सामाजिक परिणाम (Social Outcomes of Social Revolution):

सोरोकिन ने भी आधुनिक काल की अनेक क्रान्तियों का विस्तृत अध्ययन करके कुछ सामाजिक परिणाम निकाले हैं जो इस प्रकार हैं:

i. क्रान्ति का चक्र:

क्रान्तिकारी परिवर्तनों में प्रायः एक पुनरावृती चक्र देखने को मिलता है । प्रत्येक क्रान्ति में दो अवस्थायें होती हैं, एक तो ‘विनाशकारी अवस्था’ जिसमें क्रांति न केवल शुष्क संस्थाओं तथा मूल्यों को, बल्कि उन संस्थाओं तथा सांस्कृतिक मूल्यों को भी नष्ट करती है जो महत्वपूर्ण, सृजनात्मक तथा विकासगामी होते हैं ।

इनको अस्थाई रूप से छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है और उनका विकास रोक दिया जाता है । दूसरी अवस्था होती है ‘अवनति अवस्था’ जिसमें महत्वपूर्ण संस्थायें तथा मूल्य पुन: उभरने लगते है, विकसित होते है तथा क्रान्ति की विनाशकारी शक्तियों को पीछे हट जाने को प्रोत्साहित करते है ।

ii. ध्रुवीकरण का सिद्धान्त:

लगभग सभी क्रान्तियों में ध्रुवीकरण का नियम क्रियाशील देखा जा सकता है । इस नियम का सम्बन्ध क्रान्ति में जनसंख्या के विभिन्न तत्वों तथा स्वयं उसकी अपनी गतिविधियों पर विपरीत प्रभाव से है । सामान्य समय में अधिकांश जनसंख्या न तो स्पष्ट रूप से बुरी, न ही स्पष्ट रूप से भली, न अत्यधिक सामाजिक और न ही अत्यन्त समाज-विरोधी, न स्पष्ट रूप से धार्मिक या अधार्मिक होती है ।

क्रांति के समय ये उदासीन विरोधी ध्रुवों की ओर चल पड़ते हैं, कुछ पापी, कुछ सन्त, कुछ सामाजिक परमार्थवादी तथा कुछ समाज-विरोधी अहंमवादी हो जाते है । इस प्रकार का ध्रुवीकरण समस्त सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में देखा जा सकता है ।

iii. महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में परिवर्तन:

प्रमुख क्रान्तियों में जनसंख्या में जन्म दर गृह युद्ध के लगभग नौ माह बाद घटने लगती है । विनाशकारी अवस्था का अन्त होने के बाद यह पुन: बढ़नी शुरू होती है और बाद के दो तीन वर्षों के दो तीन वर्षों में क्रान्ति पूर्व काल के स्तर से भी ऊपर चली जाती है । तब इसके बाद वह अपने क्रान्ति पूर्व स्तर पर आती है । इसी प्रकार मृत्यु दर भी घटती-बढ़ती हैं । यही बात विवाह-दर तथा तलाक या परित्याग दर के साथ भी लागू होती है । आत्म-हत्याओं की दर में भी इसी प्रकार के उतार चढ़ाव आते हैं ।

iv. मनोविज्ञान तथा व्यवहार में परिवर्तन:

ये परिवर्तन निम्न रूप में समझे जा सकते हैं:

(a) व्यक्तित्व संरचना का छिन्न-भिन्न होना,

(b) प्रत्यक्ष व्यवहार पर प्रभाव,

(c) विचारों की प्रतिक्रिया तथा सम्बन्धित वैचारिकी का प्रभावित होना,

(d) सम्पत्ति सम्बन्धों पर प्रभाव,

(e) लैंगिक व्यवहार तथा सम्बन्धों पर प्रभाव,

(f) नैतिक एवं धार्मिक आवरण पर प्रभाव ।

v. सामाजिक संरचनाओं में परिवर्तन:

क्रान्तियों में सामाजिक संरचनाओं में महत्वपूर्ण परिवर्तन आते है जिन्हें निम्न रूप में देखा जा सकता है:

(a) अन्तःसमूह सामाजिक विभेदीकरण,

(b) अन्तर्समूह संस्तरण,

(c) अन्तर्समूहों में विभेदीकरण,

(d) पारस्परिक संस्तरण ।

vi. व्यक्तियों के सामाजिक परीक्षण, चुनाव तथा वितरण की यांत्रिकी में परिवर्तन आना:

क्रांति की प्रथम अवस्था में सम्पूर्ण जनजीवन प्रभावित होने लगता है । न तो आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, सांस्कृतिक प्रकार्य और न ही सैनिक प्रकार्य ही संतोषजनक रूप से सम्पादित होते है । इसके परिणामस्वरूप जनता में तीव्र असमायोजन एवं उत्पीड़न उत्पन्न हो जाता है जो सत्ताधारी दल की शक्ति के लिए हानिकारक स्थिति होती है ।

इस लिए यह आवश्यक हो जाता है कि सदस्यों के परीक्षण चुनाव तथा वितरण की यांत्रिकी को कम से कम कुछ अंशों तक तो पुन: स्थापित कर दिया जावे । यह प्रक्रिया पहली अवस्था के अतः तक प्रारम्भ हो जाती है और दूसरी अवस्था तक चलती रहती है । दूसरी अवस्था के अंत तक विभिन्न स्तरों पर जो व्यक्ति होते हैं वे पुराने तथा नये तत्वों का मिश्रण होते है ।

vii. सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन:

सभी क्रांतियों में यह देखा गया कि ऐच्छिक तथा विशेष रूप से अनैच्छिक प्रवासिता सामान्य तथा विभेदीकृत गतिशीलता तथा रैखिक गतिशीलता बड़े पैमाने पर होने लगती हैं । क्रांति की पहली अवस्था में आर्थिक जीवन छिन्न-भिन्न हो जाता है । जीवन स्तर गिर जाता है ।

गरीबी, बेकारी, भुखमरी बद जाती है । राजनीतिक जीवन भी अनिश्चित सा हो जाता है । संस्कृति के समस्त क्षेत्रों विज्ञान तथा दर्शन, धर्म तथा नैतिकता साहित्य तथा कला, राजनीति तथा कानून, सभी पर क्रांति की छाप होती है । सांस्कृतिक मूल्यों में भारी परितर्वन आते हैं ।


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