Read this article in Hindi to learn about the ecological approach to comparative public administration.

”पर्यावरण अपने प्रशासन को प्रभावित और निर्धारित करता है ।” पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण की मान्यता यही है । अंग्रेजी में पर्यावरण के लिये ”इकोलॉजी” शब्द प्रयुक्त होता है जिसका विशुद्ध हिन्दी अर्थ है, ‘पारिस्थितिकी’ । यह मूलत: जीव विज्ञान का शब्द है जहां इसका अर्थ है, जीवों और उनके प्राकृतिक वातावरण में परस्पर-निर्भरता । लोक प्रशासन में इसे सर्वप्रथम प्रयुक्त किया 1947 में जान एम.गॉस ने । उन्होनें ही सर्वप्रथम सरकारी कार्य को उसके परिवेश से जोड़ने की धारणा प्रतिपादित की । इसी वर्ष राबर्ट ढहल और 1952 में रॉस्को मार्टिन ने भी प्रशासन-पर्यावरण के परस्पर अंत: संबंधों का समर्थन करते हुऐ अंतःसांस्कृतिक अध्ययनों पर जोर दिया । लेकिन प्रायोगिक तौर पर प्रशासन-पर्यावरण संबंधों का विस्तृत अध्ययन किया फ्रेडरिग्स ने । रिग्स का जन्म चीन में हुआ लेकिन वह अमेरिका के निवासी बन गये । तुलनात्मक लोक प्रशासन के अपने अध्ययन में फ्रेडरिग्स ने संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम का प्रयोग सर्वप्रथम 1957 में तब किया था, जब वाल्डों ने दो वर्ष पूर्व 1955 में इसकी उपयोगिता बतायी थी ।

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यह जानते हुए भी कि संरचना और कार्य सभी समाजों में एक जैसे नहीं होते, अन्य विद्वानों की भांति फेडरिग्स ने भी इन्हें निर्धारित करने का प्रयास किया । फ्रेड रिग्स ने 1961 में प्रकाशित अपनी कृति “The Ecology of Public Administration”, में प्रत्येक समाज (संरचना) की 5 कार्यात्मक विशेषताएं बतायी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक (सांकेतिक) आर्थिक और संचारिक । रिग्स ने विकासशील देशों की प्रशासनिक व्यवस्था को स्पष्ट करने हेतु विकसित, विकासशील और पिछड़े देशों के प्रशासन की तुलना इस उपागम के साथ पारिस्थितिकीय और सामान्य व्यवस्था उपागम के आधार पर की । रिग्स ने इस तुलना के आधार पर विकासशील देशों के समाज को ऐसे “प्रिज्मेटिक समाज” की संज्ञा दी जिसके हर क्षेत्र (राजनीति, प्रशासन, आर्थिक सभी) में अनेक संरचनाएं तो स्थापित हो गयी है लेकिन कार्यों के मध्य प्रभावी एकीकरण नहीं हो पाया है । इस संदर्भ में सी. वेस्टचर्चमैन की 1968 में प्रकाशित रचना “The System Approach” तथा हरबर्ट साइमन की मार्च की कृति “Organisation” (1959) भी महत्वपूर्ण है ।

रिग्सीयन आदर्श मॉडल (Rigsian Ideal Type Model):

फ्रेडरिग्स का नाम प्रशासनिक चिंतकों में अग्रणी है । उन्होंने प्रशासनिक सिद्धान्त निर्माण की प्रकिया में तुलनात्मक अध्ययन पद्धति को अपनाया, ताकि सभी प्रकार के प्रशासनों का तुलनात्मक अध्ययन करके मौलिक संगठनात्मक तत्वों तक पंहुचा जा सके । दूसरे शब्दों में रिग्स सार्वभौमिक प्रशासनिक सिद्धान्त के लिये भिन्न-भिन्न प्रशासनिक परिस्थितियों में अन्तर्निहित कारणों का विश्लेषण करना चाहते थे ।

1971 में चीन के गुलिका ग्राम में जन्में लेकिन अमेरिकी परिवेश में पढ़े रिग्स को ग्रामीण और शहरी दोनों भिन्न परिवेश में पलने-बढ़ने का अवसर मिला जिसने उनके मस्तिष्क में स्वाभाविक तुलनात्मकता को जन्म दिया । और संभवत: इसीलिये उनके तुलनात्मक अध्ययन की शुरूवात ”सामाजिक परिवेशों” की तुलना से होती है, जो बाद में ”प्रशासनिक परिवेश” पर जाकर केन्द्रीत हो जाती है ।

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लोक प्रशासन के विकास में रिग्स का महत्वपूर्ण योगदान है, उसके द्वारा विकसित आदर्श मॉडल । रिंग्स ने पिछड़े, विकासशील और विकसित समाजों का अध्ययन करने के उपरान्त अपने मॉडलों से यह दर्शाने की कोशिश की कि पर्यावरण और प्रशासन का कितना गहरा अन्तर्सम्बन्ध होता है तथा विकास की प्रकिया में विभिन्न संरचनाओं का निर्माण, उनके कार्यों में विशेषीकरण और इस संरचनाओं के मध्य एकीकरण की प्रवृत्ति कैसी होती है ।

रिग्स के योगदान को निम्नाँकित शीर्षकों में रखा जा रहा है:

विकास का अर्थ स्वायत्तता की मात्रा से:

रिग्स ने ”विकास” का अर्थ बताया- किसी सामाजिक प्रणाली को प्राप्त स्वायत्ता की वह मात्रा जो उसमें निरन्तर परिवर्तन और गतिशीलता सुनिश्चित करती है । वह मानवीय समाज उतना ही अधिक विकसित होगा जिसमें अपने पर्यावरण में अनुकूल परिवर्तन लाने की अधिक से अधिक क्षमता या स्वायत्तता होगी । इस स्वायत्तता को प्राप्त करने के लिये वियोजन (Diffraction) का स्तर ऊँचा उठाना जरूरी होता है ।

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तुलनात्मक अध्ययन की 3 दिशायें:

फ्रेडरिग्स ने प्रशासन के तुलनात्मक अध्ययन के लिये तीन व्यापक परिपेक्ष्य

निर्धारित किये, जो वस्तुत: प्रशासनिक अध्ययन की 3 नवीन प्रवृत्तिया या दिशायें बन गयी:

1. आदर्श के स्थान पर अनुभव मूलक व्यवहारिक अध्ययन प्रवृत्ति:

रिग्स के अनुसार पहले के अध्ययन ”या होना चाहिये” पर केन्द्रीत आदर्शात्मक (प्रतिभानात्मक) अध्ययन रहे हैं, जो वास्तविक स्थिति की उपेक्षा करते हैं । रिग्न ने इसके स्थान पर अनुभववादी पद्धति का विकास किया जिसके अन्तर्गत वास्तविक तथ्यों का गहन विश्लेषण कर व्यवहारिक निष्कर्ष निकाले जाते है ।

वस्तुत: पारम्परिक लोक प्रशासन में आदर्शात्मक लक्ष्यों को निर्धारित कर उनकी प्राप्ति पर जोर दिया जाता था, बिना वास्तविकता को समझे या जाने । व्यवहारवादियों के प्रभाव से लोक प्रशासन में आर्दशात्मक और आदेशात्मक दोनों तरह के अध्ययनों को अस्वीकृत किया गया और उसके स्थान पर यथार्थपरक और अनुभव सम्बन्धी अध्ययन को अपनाया गया । अब मूल्यात्मक अध्ययन के स्थान पर विश्लेषण परक व्यवहारिक अध्ययन तुलनात्मक लोक प्रशासन का केन्द्र बिन्दु बन गया ।

2. इडियाग्राफिक (विशिष्ट भावसूचक) से नौगोथैटिक (सामान्य तथ्यपरक) अध्ययन प्रवृत्ति:

रिग्स ने पारम्परिक अध्ययनों को “इडियोग्राफिक” की संज्ञा दी । इन अध्ययनों में प्रशासनिक विश्लेषण के लिये किसी विशेष विषय-वस्तु को चुना जाता था जैसे भर्ती की समस्या । रिग्स के अनुसार तुलनात्मक लोक प्रशासन के लिये नौमोथेटिक अध्ययन पद्धति उपर्युक्त है जिसके अन्तर्गत सामान्य तथ्य परक अध्ययन किये जाते हैं । इसमें वास्तविक व्यवहार और उनके परस्पर संबंधों का अध्ययन कर उन्हें सारणी बद्ध किया जाता है । इससे व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों की नियमितता पता चलती है । यह पद्धति सामान्य रूप से सभी प्राशासनिक समस्याओं के लिये प्रयुक्त होती है ।

3. गैर पारिस्थितिकीय से पारिस्थितिकीय अध्ययन प्रवृत्ति:

पारम्परिक लोक प्रशासन के अध्ययन पारिस्थितिकीय-उनमुख नहीं थे अर्थात् प्रशासन-पर्यावरण के परस्पर प्रभावों की उपेक्षा की जाती रही लेकिन अब लोक प्रशासन पारिस्थितिकीय-उम्मुख दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया गया है । यह स्वीकार्य तथ्य है कि गतिशील या परिवर्तित पर्यावरण में स्थिति प्रशासन के वास्तविक व्यवहार को तभी समझा जा सकता है जब पर्यावरण-प्रशासन के परस्पर प्रभावों का गहन अध्ययन-विश्लेषण किया जाये ।

इस प्रकार रिग्सू ने तुलनात्मक अध्ययन के लिये मूल्यांत्मक, सिद्धान्तवादी, गैर पर्यावरणीय पद्धति को विश्लेषणात्मक, विधिक और पारिस्थितिकीय पद्धति से प्रस्थापित कर दिया ।

तीन दृष्टिकोणों का उपयोग:

रिग्स ने अपने प्रशासनिक अध्ययनों के लिये तीन दृष्टिकोणों का प्रयोग किया है पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण, संरचनात्मक-कार्यात्मक दृष्टिकोण और व्यवस्था दृष्टिकोण । यद्धपि मुख्य रूप से प्रथम दो दृष्टिकोणों का ही उपयोग रिग्स ने किया है ।

पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण:

लोक प्रशासन में इस दृष्टिकोण का प्रयोग सर्वप्रथम जे. एम. गॉस ने किया था । इसके बाद राबर्ट ढहल, राबर्ट मर्टन आदि ने भी अपने प्रशासनिक अध्ययनों में पारिस्थितिकीय नजरीया अपनाया लेकिन यह रिग्सू थे जिन्होंने इसका सर्वाधिक उपयोग किया ।

जहां गाँस ने लोक प्रशासन के पर्यावरण में लोग, सम्पत्ति, जरूरी भौतिक और सामाजिक तकनीकी, विचार, व्यैक्तिकता, आपाद स्थितियां आदि को शामिल किया है, वही रिग्सू ने इसे अत्यधिक व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हुऐ आर्थिक, राजनीतिक, सांकेतिक, संचारगत आदि पर्यावरण तक विस्तृत किया ।

रिग्स ने अपने विकास और तुलनात्मक प्रशासनिक अध्ययनों में इस दृष्टिकोण का खूब इस्तेमाल और विकास किया । चीन के ढाँचों का विश्लेषण भी किया । उन्होंने फिलीपिन्स, थाइलैंड, चीन आदि देशों का अध्ययन करके स्पष्ट किया कि उक्त पर्यावराणीय कारक अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को किस तरह प्रभावित और निर्धारित करते है ।

साथ ही प्रशासन भी पर्यावरण को प्रभावित करता है । पर्यावरण-प्रशासन की इस पारस्परिक प्रक्रिया क समझ ही ”प्रशासन का पारिस्थितिकीय” दृष्टिकोण है और इस दृष्टिकोण के बिना प्रशासन पर्यावरण की अन्त: किया और परस्पर निर्भरता की गहरी जानकारी नहीं मिल सकती ।

संरचनात्मक-कार्यात्मक दृष्टिकोण:

इस उपागम का पहला प्रयोग मानव विज्ञान में मैलिनावस्की और रैडक्लिफ ब्राउन ने किया था । आज यह लगभग हर सामाजिक विज्ञान में प्रयुक्त किया जाता है । टालकाट पारसंस ने समाज शास्त्र तके इसका अच्छा प्रयोग किया । लोक प्रशासन में इसका विकास किया ।

फेडरिग्स ने इस उपागम को शास्त्रीय विचारकों और व्यवहारवादियों के मुख्य निष्कर्षों का योग माना । पहले ने संरचना पर तथा दूसरे ने कार्य या व्यवहार पर बल दिया है । संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम इन दोनों को नये स्वरूप में, नयी व्याख्या के साथ प्रस्तुत करता है ।

इसके अनुसार समाज में प्रत्येक संरचना विशिष्ट कार्य करती है । यह कार्य या व्यवहार अपनी सामाजिक व्यवस्था के लिये एक मानकर होता है। इस प्रकार इस उपागम के दो मुख्य तत्व है एक संरचना, दूसरा कार्य । सभी संरचनाएं इसलिये अस्तित्व में हैं क्योंकि वे कुछ कार्य करती है या कार्य करने के लिये बनायी गयी हैं ।

लेकिन संरचना और उसके कार्यों के बीच कोई स्पष्ट और प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो, जरूरी नहीं है । उदाहरण के लिये सभी समान संरचनाएं एक जैसे कार्य भी कर सकती है और अलग-अलग कार्य भी कर सकती हैं । कोई संरचना बहुत से कार्य संपादित कर सकती है और इसी प्रकार एक ही कार्य अनेक संरचनाओं के द्वारा सम्पन्न होते दिखायी दे सकते है । ऐसा संरचनाओं के परस्पर सम्बन्धों के कारण दिखायी देता है । इस प्रकार निर्धारित कार्यों को सम्पन्न करने वाली विभिन्न संरचनाओं का तुलनात्मक अध्ययन-विश्लेषण करना ही इस दृष्टिकोण का केन्द्रीय तत्व है ।

रिग्स ने पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से प्रशासनिक व्यवस्था का विश्लेषण करने में संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम को मुख्य रूप से अपनाया । तुलनात्मक लोक प्रशासन के अपने अध्ययन में फ्रेडरिग्स ने संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम का प्रयोग सर्वप्रथम 1957 में तब किया था, जब वाल्डों ने दो वर्ष पूर्व इसकी उपयोगिता बतायी थी ।

यह जानते हुऐ भी कि संरचना और कार्य सभी समाजों में एक जैसे नहीं होते, अन्य विद्वानों की भाँति फ्रेडरिग्स ने भी इन्हें निर्धारित करने का प्रयास किया । रिग्स नें प्रत्येक समाज (संरचना) की 5 कार्यात्मक विशेषताएं बतायीं राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, (सांकेतिक) आर्थिक और संचारिक ।

रिग्स ने विकासशील देशों की प्रशासनिक व्यवस्था को स्पष्ट करने के लिये विकसित, विकासशील और पिछड़े राष्ट्रों के प्रशासन की तुलना इस उपागम के साथ पारिस्थितिकीय और सामान्य व्यवस्था उपागम के आधार पर की । रिग्स ने इसी तुलना के आधार पर विकासशील देशों के समाज को ऐसे ”प्रिज्मेटिक समाज” की संज्ञा दी जिसके हर क्षेत्र (राजनीति, प्रशासन, आर्थिक सभी) में अनेक संरचनाए तो स्थापित गयी हैं लेकिन कार्यों के मध्य प्रभावी एकीकरण नहीं हो पाया है । रिग्स के बाद तो अनेक विद्वानों ने इस उपागम का प्रयोग तुलनात्मक लोक प्रशासन के अध्ययन में किया है ।

सामान्य व्यवस्था उपागम:

रिग्स ने संरचनात्मक कार्यात्मक उपागम का ही मुख्य रूप से प्रयोग किया है लेकिन इस रूप में कि वह कभी-कभी व्यवस्था उपागम तक विस्तारित हो जाता है । रिग्स ने संरचनाओं और उनके कार्यों का वर्णन करते समय पारिस्थितिकीय घटकों के प्रभावों की उपेक्षा नहीं की ।

यही कारण है कि उन्होंने समाज को एक व्यवस्था के रूप में देखा जिसमें प्रशासन, राजनीति, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, तकनीक आदि उपव्यवस्थायें विध्यमान है और परस्पर किया में रत हैं । रिग्स ने मॉडल निर्माण की शुरूआत 1956 से की और बाद में उनमें दो बार संशोधन किया ।

इस प्रकार समय-समय पर विकसित उसके मॉडलों की 3 कोटियां हैं:

(i) प्रारंभिक आदर्श मॉडल

(ii) तीन नये मॉडल

(iii) संशोधित पारसोनियन मॉडल