Read this article in Hindi to learn about the problems faced by dairy industry in India along with its solution.

भारत में दुग्ध उद्योग की समस्याएँ (Problems of Dairy Industry in India):

भारत में डेरी विकास की गति धीमी होने के चार प्रमुख कारण हैं:

1. दुग्ध आपूर्ति में उतार-चढ़ाव (Fluctuation in Milk Supply):

दुग्ध उद्योग की प्रमुख समस्या कच्चे दूध की उपलब्धता पर मौसम का प्रभाव होना है । देश के प्रत्येक भाग में प्रत्येक मौसम में दूध एवं उससे बने पदार्थों की माँग लगभग समान बनी रहती है परन्तु दूध का उत्पादन असमान तथा छितराया (Scattered) हुआ है ।

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वर्ष में अप्रैल से जुलाई तक कच्चे दूध की कमी तथा नवम्बर से फरवरी तक कच्चे दूध की उपलब्धता में 200 से 300 प्रतिशत की बढौतरी, डेरी व्यवसाय की क्षमता को प्रभावित करती है ।

2. विवेक रहित मूल्य नीति (Irrational Pricing Policy):

दूध का भाव बाजार में मांग तथा पूर्ति द्वारा निर्णीत होता है । जो परिणामतः दुग्ध पदार्थों की कीमत को भी प्रभावित करता है । यह भिन्नता दुग्ध उत्पादकों तथा दुग्ध परियोजनाओं के मध्य स्थायी सम्बन्ध स्थापित नहीं होने देता है तथा उत्पादक को दुग्ध-मूल्य के सम्बन्ध में अनिश्चिय बना रहता है ।

यह उद्योग दीर्घकालीन उद्योग है । अतः दुग्ध-परियोजनाओं को सफल बनाने हेतु यह अत्यावश्यक है कि दुग्ध उत्पादकों को दूध की कीमत उसकी उत्पादन लागत से अधिक प्राप्त होती रहनी चाहिए ताकि व्यवसाय आर्थिक बना रहे ।

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3. यातायात के अपर्याप्त साधन (Poor Means of Transportation):

दूध का उत्पादन मुख्यतया गांवों में होता है जबकि उसका मुख्य उपभोक्ता शहर में रहता है परिवहन के साधनों के अभाव में गाव में दुग्ध उत्पादक को उसके उत्पाद का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पाता है । विशेषकर Flush Season में दूध को कम कीमत पर बेचना पड़ता है या घी में परिवर्तित करना पड़ता है जो उत्पादक के लिए आर्थिक नहीं है । परिवहन की उचित व्यवस्था होने पर इस उद्योग की वृद्धि दर में विकास होगा ।

4. दूध की प्रकृति एवं संग्रहण सुविधाओं का अभाव (Nature of Milk and Lack of Storage Facilities):

दूध जल्दी खराब होने वाला (Perishable) पदार्थ है अतः उचित संग्रहण अवस्थाओं के अभाव में दूध को अधिक समय तक एकत्र करके नहीं रखा जा सकता । दूहने के 3-4 घंटे बाद दूध खराब होना प्रारम्भ हो जाता है । यदि उत्पादन केन्द्रों पर अवशीतन केन्द्र बन जाये तो उत्पादक को अपना दूध कम मूल्य पर बेचने को विवश नहीं होना पड़ेगा तथा डेरी विकास दर को बढावा मिलेगा ।

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5. कम उत्पादकता की समस्या (Problem of Low Productivity):

देश में दुधारु पशुओं का वार्षिक उत्पादन काफी कम है । भारत में गायों का औसत वार्षिक दुग्ध उत्पादन (उत्पादकता) मात्र 917 kg. है जबकि इजराईल में 9787 kg तथा संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में 8388 kg. है । भारत में भैंस की उत्पादकता 1000 कि.ग्रा. है । कम उत्पादकता का कारण निम्न गुणवत्ता की प्रबन्धन व्यवस्था (Poor Management) भी है ।

दुग्ध उत्पादकों में पशु प्रजनन ज्ञान के अभाव के कारण यहाँ अपने पशु को ग्याभिन कराते समय केवल पशु से अगला ब्यान्त प्राप्त करने पर ध्यान रहता है न कि उससे प्राप्त होने वाले बच्चे की गुणवत्ता पर । अतः पशुओं के गुणों में पीढी दर पीढी कमी आती जा रही है ।

डेरी पशुओं में उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए पशु प्रजनन तथा प्रबन्धन का तकनीकी ज्ञान उत्पादक तक प्रेषित किया जाना आवश्यक है । देश में संकर गाय की उत्पादकता 2127 kg. है ।

6. दूध की खराब गुणवत्ता (Poor Quality of Milk):

भारत,विश्व में दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से प्रथम स्थान पर है परन्तु दूध की प्रति व्यक्ति उपलब्धता मात्र 238 ग्राम प्रतिदिन है जो विश्व के औसत (260 ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति) से भी कम है जबकि कुछ देशों में दुग्ध उपलब्धता बहुत अधिक है ।

उदाहरणार्थ न्यूजीलैंड में 9877 gm/head/day है । इतनी कम मात्रा में दूध की उपलब्धता होने के कारण उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है बल्कि कुछ रसायनों से दूध जैसा विलयन तैयार कर के, उसकी दूध में मिलावट भी की जा रही है । इस सबके परिपेक्ष्य में हम कह सकते हैं कि देश में दूध की रासायनिक व सूक्ष्म जैविक गुणवत्ता काफी खराब है ।

दुग्ध उत्पादक पशुओं की उत्पादकता वृद्धि के साथ-साथ उत्पादित दूध की गुणवत्ता उसके धारण व वितरण परिस्थितियों में सुधार हेतु अनुसंधान व विकास की तत्काल आवश्यकता है ।

दुग्ध उद्योग की समस्या के समाधान हेतु सरकारी नीतियां (Government Policies to Solve the Problems of Dairy Industry):

दुग्ध उद्योग विकास पर भारत सरकार ने स्वतन्त्रता के तुरन्त पश्चात् पर्याप्त चिन्तन किया तथा विभिन्न योजनाएं लागू की । सरकार के दुग्ध उद्योग विकास पर चिन्तन का स्पष्ट प्रमाण विभिन्न पंच वर्षीय योजना कालों में इस क्षेत्र के विकास पर किया गया खर्च है ।

दुग्ध उद्योग के विकास के लिए सरकार द्वारा किये गये धन विनियोग से पता चलता है कि सरकार ने पशु पालन पर दूध उद्योग की अपेक्षा अधिक ध्यान दिया है ।

पशु पालन के विकास के लिए चलाई गयी प्रमुख योजनाएँ निम्नवत् हैं:

1. मूल ग्राम योजना (Key Village Scheme):

देश में वैज्ञानिकों के सामने पशुओं की अधिक संख्या तथा उनकी कम उत्पादकता एक चुनौती बनी हुई है । सन् 1926 में Royal Commission on Agriculture ने पशु सुधार के लिए आदर्श प्रजनन नीति (Ideal Breeding Policy) का सुझाव सरकार को सुझाया ।

तत्कालीन ICAR (Imperial Council of Agricultural Research) के वैज्ञानिकों Wright (1937) तथा Oliver ने पशुओं के लिए संकर प्रजनन (Cross Breeding) के स्थान पर चयनित प्रजनन (Selective Breeding) तथा उच्चीकरण (Upgrading) का सुझाव सरकार को दिया ।

फलस्वरूप देश की आजादी के बाद सरकार ने मूल ग्राम योजना बनाई जिसके अन्तर्गत चुने हुए गांवों में पशुओं के लिए वैज्ञानिक प्रजनन, खाद्य व्यवस्था, स्वास्थ देख-रेख तथा प्रबन्धन पर पहली व दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं में विशेष ध्यान दिया गया ।

कृषि पर राष्ट्रीय आयोग (National Commission on Agriculture, 1976) के अनुसार यह योजना पशुओं के लिए चारा तथा दुग्ध उत्पादक की दुग्ध विपणन समस्या का निदान धन के अभाव में नहीं कर सकी । इस योजना के निरीक्षण के लिए बनी एक समिति ने सरकार को सुझाव दिया कि देश के दुग्ध उत्पादन को तेजी से बढाने के लिए चुने हुए पशुओं में सकरण की नीति अपनाई जाये ।

2. सघन पशु विकास योजना (The Intensive Cattle Development Programme):

उपरोक्त सुझाव के अनुसार सरकार ने तीसरी पंचवर्षीय योजना में दूध तथा कृषि के लिए पशुओं का विकास करने हेतु द्विउद्देशीय (Dual Purpose) पशुओं के विकास के लिए यह योजना बनाई । देशी गायों तथा भैंसों के विकास के लिए इस योजना को उन क्षेत्रों में लागू किया गया जहां पहले से सघन कृषि विकास योजनाएं (Intensive Agriculture Development Programme) लागू थी तथा पशुओं हेतु चारे की कमी नहीं थी । इस कार्यक्रम में विदेशी नस्लों का प्रयोग गौपशु सुधार के लिए किया गया ।

संकरण प्रजनन में प्रयोग की गयी नस्लें निम्नलिखित थी:

i. ब्राऊन स्विस:

इस नस्ल का प्रयोग इन्डो-स्विस प्रोजैक्ट के अन्तर्गत केरल व पटियाला में तथा इन्डो-जर्मन परियोजना के अन्तर्गत मण्डी (हिमाचल प्रदेश) तथा अलमोडा (उत्तर प्रदेश) में किया गया ।

ii. रेड-डेन:

इण्डो-डैनिस परियोजना के अन्तर्गत हैरिंगाटा (कर्नाटक) में इस नस्ल का प्रयोग संकरण हेतु किया गया । इनके अतिरिक्त विभिन्न स्थानों पर जर्सी, होलेस्टीन-फ्रीजीयन तथा हाईलैंड नस्ल के विदेशी पशुओं का प्रयोग देश में नस्ल सुधार के लिए किया जा रहा है ।

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