कृषि पर निबंध: शीर्ष छह निबंध | Essay on Agriculture: Top 6 Essays for class 8, 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essays on ‘Indian Agriculture’ especially written for school and college students in Hindi language.

कृषि पर निबंध: शीर्ष छह निबंध | Essay on Agriculture


Essay Contents:

  1. भारत की कृषि का आशय (Introduction to Agriculture)
  2. भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलें (India’s Major Food Crops)
  3. फसल चक्र (Crop Cycle)
  4. कृषि जलवायुविक प्रदेश (Agro Climatic Regions)
  5. भूमि सुधार (Land Reform)
  6. वृहद खाद्य पार्क (मेगा फूड पार्क) (Mega Food Parks)

Essay # 1. भारत की कृषि काआशय (Introduction to Agriculture):

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है । भारतीय जीवन का आधार, रोजगार का प्रमुख स्रोत तथा विदेशी मुद्रा अर्जन का माध्यम होने के कारण कृषि को देश की आधारशिला कहा जाता है । भारत को 15 कृषि जलवायुविक प्रदेशों में विभक्त किया गया है, जिसका आधार प्रदेश विशेष की भौतिक दशाओं के साथ-साथ वहाँ अपनाई जा रही कृषि विधियाँ हैं ।

सामान्य रूप से भारत की कृषि पर निम्नलिखित कारकों का प्रभाव पड़ा है । कृषि राज्य का विषय है, जिसका उल्लेख संविधान की सातवीं अनुसूची (राज्य सूची-II) के प्रविष्ट 14 में है ।

ADVERTISEMENTS:

अक्टूबर 2006 में राष्ट्रीय कृषक आयोग की सिफारिश पर कृषि को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में शामिल किया गया है । भारत के प्रथम अंतरिम मंत्रिमंडल में कृषि एवं खाद्य मंत्री डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को बनाया गया था । स्वतंत्र भारत के प्रथम कृषि मंत्री पंजाब राव देशमुख थे ।

भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है । भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग 51 प्रतिशत भाग पर कृषि कार्य होता है जबकि कनाडा के केवल 5 प्रतिशत, चीन के 11 प्रतिशत, जापान के 13 प्रतिशत एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के 20 प्रतिशत क्षेत्रफल पर कृषि कार्य होता है ।

1950-51 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 53.1 प्रतिशत था जो कम होकर 1990-91 में 29.6 प्रतिशत तथा आर्थिक समीक्षा 2012-13 के अनुसार 2011-12 में 14.1 प्रतिशत रह गया है । इसमें से 12 प्रतिशत कृषि, 1.4 प्रतिशत वन तथा 0.7 प्रतिशत मछली की भागीदारी है ।

कृषि क्षेत्र के योगदान में निरंतर इस कमी का कारण जी.डी.पी. में सेवा क्षेत्र एवं उद्योग क्षेत्रों का बढ़ना है । स्वतंत्राता के बाद भारत में प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत कृषि उत्पादन की औसत वृद्धि दर अग्रलिखित रही है ।

ADVERTISEMENTS:

भारत को 15 कृषि जलवायुविक प्रदेशों में विभक्त किया गया है जिसका आधार प्रदेश विशेष की भौतिक दशाओं के साथ-साथ वहाँ अपनाई जा रही कृषि विधियाँ भी है । सामान्य रूप से भारत की कृषि विधियाँ भी है । सामान्य रूप से भारत की कृषि पर चार प्रमुख कारकों का प्रभाव पड़ा है । कृषि के विकास पर सामान्य रूप से निम्न कारकों का प्रभाव पड़ता है ।

1. भौतिक कारक (Physical Factor):

इसके अन्तर्गत जलवायु की विभिन्न दशाओं जैसे वर्षा, तापमान, आर्द्रता, मिट्‌टी की उर्वरता, स्थलाकृतिक ढाल एवं भौगोलिक उच्चावच्च को शामिल किया जाता है ।

2. संस्थागत कारक (Institutional Factors):

ADVERTISEMENTS:

इसके अन्तर्गत भूमि सुधार अर्थात् बिचौलियों का अंत, चकबंदी, हदबंदी एवं काश्तकारी सुधार जिसमें लगान का नियमन, काश्त अधिकार की सुरक्षा तथा काश्तकारों का भूमि पर मालिकाना अधिकार आता है ।

इसके अतिरिक्त भूमि का पुनर्वितरण और पुराने भूमि सम्बंधों को समाप्त करना । इन सभी समस्याओं की जड़ अंग्रेजों द्वारा अपनाई गयी शोषणकारी भू-धारण पद्धतियों में निहित थी ।

3. संरचनात्मक कारक (Structural Factors):

इसके अन्तर्गत कृषि में आधुनिकता एवं उत्पादकता बढ़ाने वाली तकनीकी उपकरण, कृषि शोध पद्धतियों एवं विज्ञान आधारित निवेश को शामिल किया जाता है । इनमें उच्च उत्पादकता वाले बीज (HYV), रासायनिक एवं जैव उर्वरक, सिंचाई, ऊर्जा, मशीनीकरण व कीटनाशक के साथ-साथ कृषि विपणन, कृषि साख एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि प्रमुख हैं ।

भारतीय कृषि में हरित क्रांति की उपलब्धियों को दीर्घजीवी बनाने के लिए सतत् अथवा हरित कृषि को प्राथमिकता दी जा रही है ।

4. राजनीतिक प्रशासनिक प्रयास (Political Administrative Effort):

संस्थागत एवं संरचनात्मक कारकों की सफलता काफी हद तक कृषि को गति देने वाले राजनीतिक व प्रशासनिक निर्णयों एवं प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है । न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि बीमा साख की उपलब्धता, कृषि वित्त, ऋण प्रवाह, विपणन व भंडारण केन्द्रों तथा अन्य आधारभूत कृषि संरचना एवं विकास इसी पर आधारित होते हैं ।

5. तकनीकी दक्षता (Technical Efficiency):

तकनीकी दक्षता एवं कुशलता वर्तमान कृषि व्यवस्था को प्रभावित करने वाले सबसे गतिशील प्रभावी कारक हैं । किसान कॉल सेंटर, ग्रामीण ज्ञान केन्द्र, ई-चौपाल, ग्रामीण जॉब परीक्षा केन्द्र, कृषि उपज भंडारण, बागवानी एवं रोपण, ऊर्जा संरक्षण एवं कृषि प्रशिक्षण जैसी तकनीक के माध्यम से कृषि उत्पादकता को नया आधार मिला है ।

6. शस्य गहनता (Crop Intensification):

शस्य गहनता अथवा फसल गहनता का अर्थ है, एक ही खेत में एक कृषि वर्ष में उगाई गई फसलों की संख्या (बारंबारता) । दूसरे शब्दों में, किसी कृषि योग्य भूमि पर एक वर्ष में जितनी बार फसल उगाई जाती है, वह उस भूमि की शस्य गहनता कहलाती है । शस्य गहनता प्राकृतिक दशाओं, सामाजिक, आर्थिक एवं संस्थागत कारकों द्वारा प्रभावित होती है ।

शस्य गहनता को सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है:

वर्ष 2009-10 के अनुसार भू-उपयोग सांख्यिकी के अनुसार देश में कृषि भौगोलिक क्षेत्र 32.87 मिलियन हेक्टेयर है, जिसमें से 140 मिलियन हेक्टेयर निवल बोया गया क्षेत्र और 199.2 मिलियन हेक्टेयर सकल फसल क्षेत्र है । इस प्रकार फसल सघनता 137.3 प्रतिशत आँकी गयी थी ।

वर्ष 1950-51 में खाद्यान्न फसलों के अन्तर्गत 76.7 प्रतिशत भूमि थी । वर्तमान में यह घटकर 65.6 प्रतिशत रह गई है । कृषि योग्य भूमि की दृष्टि से विश्व में तीन शीर्ष राष्ट्र- संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत एवं चीन हैं ।

भूमि उपयोग नियोजन तथा भूमि संस्थान के इष्टतम उपयोग के लिए 1988 ई. में राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति तैयार की गई थी, जिसका उद्देश्य देश की भूमि उपयोग का विस्तृत तथा वैज्ञानिक सर्वेक्षण करना है ।

7. शस्यन प्रणाली:

यह स्थान विशिष्ट प्रणाली है जो वातावरण को उबलने से परिवर्तित हो जाती है । अतः फसलोत्पादन के सभी अवयवों तथा इनका आपसी सम्बंध और वातावरण के साथ सामंजस्य होना शस्यन प्रणाली कहलाती है । इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य सभी संसाधनों जैसे भूमि, जल और सौर विकिरणों का समुचित उपयोग करना है ।


Essay # 2. भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलें (India’s Major Food Crops):

खाद्यान्न का अभिप्राय घास कुल (ग्रेमिनी) के उन पौधों से है, जिन्हें दाने के लिए उगाया जाता है ।

इन्हें तीन वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं:

i. प्रमुख खाद्यान्न (Principal Food Crop):

इसके अन्तर्गत गेहूँ, धान एवं जौ को सम्मिलित किया जाता है ।

ii. मोटे अनाज (Cereals):

इसके अन्तर्गत मक्का, ज्वार, बाजरा तथा मडुआ आते हैं ।

iii. लघु खाद्यान्न (Grains):

इसके अंतर्गत मंडुवा या रागी, कोदो, साँवा, काकुन, चना तथा कुटकी को इसमें शामिल किया जाता है ।


Essay # 3. फसल चक्र (Crop Cycle):

भारत की भौतिक संरचना, जलवायुविक एवं मृदा संबंधी विभिन्नताओं के कारण यहाँ अनेक प्रकार के फसलों की कृषि की जाती है । भारत का कृषि वर्ष 1 जुलाई से 30 जून तक माना जाता है ।

एक निश्चित अवधि में किसी निश्चित क्षेत्र में फसलों को इस क्रम में उगाना कि उर्वरा शक्ति का कम से कम ह्रास हो, ‘फसल चक्र’ कहलाता है । फसल चक्र के निर्धारण में यह ध्यान रखा जाता है, कि कम गहरी जड़ वाली फसलों के बाद गहरी जड़वाली फसल उगाना चाहिए; जैसे- अरहर के बाद गेहूँ और दलहनी फसल के बाद अदलहनी फसलें बोना चाहिए ।

अधिक खाद एवं पानी चाहने वाले फसलों के बाद कम खाद व कम पानी चाहने वाले फसलों की खेती करनी चाहिए । फसल चक्र को अपनाने से मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती है तथा रोग, कीट एवं खरपतवार के नियंत्रण में सहायता मिलती है एवं साथ ही सीमित साधनों का अधिकतम उपयोग कर अधिक उत्पादन करना संभव होता है ।

शस्य प्रतिरूप के आधार पर देश में तीन प्रकार की कृषि दृष्टिगत होती है- एक फसली, दो फसली एवं बहु फसली ।

‘फसल चक्र सघनता’ ज्ञात करने का सूत्र है:

फसल चक्र के उदाहरणों में एक वर्षीय (चरी, वरसीम 200 प्रतिशत धान-गेहूँ-मूँग 300 प्रतिशत एवं टिण्डा-आलू-मूली-करेला), द्विवर्षीय (कपास-मटर-परती-गेहूँ 150 प्रतिशत, चरी-गेहूँ कम चरी-मटर 200 प्रतिशत) एव तीन वर्षीय (हरी खाद-आलू-गन्ना-पेडी 133 प्रतिशत, मूंगफली-अरहर-गन्ना-मूँग-गेहूँ 167 प्रतिशत) देश के विभिन्न भागों में पारिस्थितिकीय अंतर के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के फसल चक्र अपनाए जा रहे हैं, जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान-गेहूँ आदि जिनकी पादप पोषक तत्व आवश्यकता एवं फसलों की उत्पादकता अधिक है ।

इसके कारण उर्वरता एवं उत्पादकता इस सघन कृषि पद्धति से घटती जा रही है । अतः ‘एकीकृत पादप पोषक तत्व प्रबन्धन’ को अपनाना जरूरी है, जिसमें खरीफ में 50 प्रतिशत एनपीके तत्व जीवाश्म खाद से तथा 50 प्रतिशत एनपीके उर्वरकों से दिए जाने चाहिए ।

वर्ष में मुख्यतः तीन फसलें पैदा की जाती हैं जो निम्नलिखित हैं:

1. रबी की फसल:

यह सामान्यतया अक्टूबर-नवम्बर में बोकर अप्रैल-मई तक काट ली जाती है । सिंचाई की सहायता से तैयार होने वाली इस फसल में मुख्यतः गेहूँ, जौ, चना, मटर, सरसों, राई आदि की कृषि की जाती है ।

2. खरीफ की फसल:

यह वर्षा काल की फसल है, जो जून-जुलाई में बोकर सितम्बर-अक्टूबर तक काट ली जाती है । इसके अंतर्गत चावल, ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का, जूट, मूंगफली, कपास, पटसन, तम्बाकू, मूंग, उड़द, लोबिया आदि की कृषि की जाती है ।

3. जायद की फसल:

यह फसल रबी एवं खरीफ के मध्यवर्ती काल में अर्थात् मार्च में बोकर जून तक काट ली जाती है । इसमें सिंचाई के सहारे सब्जियों तथा तरबूज, खरबूज, ककड़ी, खीरा, करेला आदि की कृषि की जाती है । मूँग, उड़द व कुटी जैसी दलहन फसलें भी इस समय उगायी जाती हैं ।


Essay # 4. कृषि जलवायुविक प्रदेश (Agro Climatic Region):

कृषि जलवायुविक प्रदेश को निर्धारित करने के लिए वर्षा, तापमान, मिट्‌टी संबंधित विशेषताएँ, इस क्षेत्र में अपनाई जा सकने वाली कृषि पद्धति एवं क्षेत्र विशेष की पर्यावरणीय समस्याओं को शामिल किया जाता है एवं उसके लिए विभिन्न प्रकार की विकास-रणनीति बनाई जाती है ।

इन आधारों पर भारतीय कृषि जलवायुविक प्रदेश को 15 वृहद् भागों में बाँटा गया है:

1. पश्चिमी हिमालय

2. पूर्वी हिमालय

3. निम्न गंगा का मैदान

4. म्ध्यगंगा का मैदान

5. ऊपरी गंगा का मैदान

6. ट्रांस गंगा मैदान

7. पूर्वी पठारी व पहाड़ी क्षेत्र

8. मध्य पठारी व पहाड़ी क्षेत्र

9. पश्चिमी पठारी व पहाड़ी क्षेत्र

10. दक्षिणी पठारी व पहाड़ी क्षेत्र

11. पूर्वी तटीय मैदान व पूर्वी घाट

12. पश्चिमी तटीय मैदान व पश्चिमी घाट

13. पश्चिमी शुष्क प्रदेश

14. गुजरात का मैदानी व पहाड़ी भाग

15. द्वीपीय प्रदेश (लक्षद्वीप, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह) ।

किसी प्रदेश विशेष की कृषि जलवायुविक विशेषताओं को बताने के लिए वहाँ की जलवायुविक दशाओं, मिट्टी की उर्वरता एवं वर्तमान कृषि पद्धतियों को विश्लेषित करते हुए नई विकास रणनीति बनाई जाती है, ताकि उस क्षेत्र में अधिकतम उत्पादकता, संतुलित व पर्यावरण अनुकूल (Eco-Friendly) कृषि का विकास हो सके ।


Essay # 5. भूमि सुधार (Land Reform):

औपनिवेशिक शासनकाल में जमींदारी, रैयतवाड़ी जैसे कृषि व्यवस्था में कृषकों का भूमि से लगाव अधिक नहीं रह गया था । परिणामस्वरूप भूमि की उत्पादकता काफी कम थी । जोत के आकार का वितरण-प्रारूप काफी असमान था । छोटे आकार के जोतों में कृषि का पर्याप्त विकास संभव नहीं था ।

भूमिहीन मजदूरों की संख्या काफी अधिक थी, जो कि भूमि के असमान वितरण का परिणाम था । इसीलिए स्वतंत्रता के बाद इन चुनौतियों पर ध्यान देते हुए 1948 ई. में भूमि सुधार संबंधी कानून बनाया गया ।

इसके तीन पहलू थे:

1. हदबंदी (Ceiling):

इसके अंतर्गत अधिकतम भूमि की सीमा निर्धारित की गई व अतिरिक्त भूमि के पुनर्वितरण का लक्ष्य रखा गया ।

2. चकबंदी (Consolidation):

इसके द्वारा जोत के आकारों को और छोटा होने से रोकने व भूमि को इकट्‌ठा कर बड़े जोतों के माध्यम से सहकारी कृषि पर बल दिया गया ।

3. काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms):

इसके माध्यम से किसानों को जोत का अधिकार प्रदान करने तथा जमींदारों के अन्याय से रक्षा करने का अधिकार दिया गया ।

1950-53 ई. के दौरान पूरे देश में जमींदारी उन्मुलन कानून बनाया गया । 2 करोड़ कृषकों को काश्तकारी अधिकार व 1 करोड़ कृषकों को मिल्कियत दी गई । परंतु, मौखिक व्यवस्था (Oral Settlement) के कारण यह पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका । 1960 के दशक में भू-दान आंदोलन के द्वारा अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण करने का प्रयास किया गया ।

परंतु भू-दान आंदोलन एवं प्रशासन में तालमेल नहीं होने के कारण दान की गई भूमि भी अभी तक दानकर्ताओं के पास ही है । अनेक मामलों में जिनको भूमि दिया गया था वे भूमि लेने के लिए नहीं आए, क्योंकि उनके पास पूँजी का अभाव था । यही कारण है कि आज भी हमारे देश में भूमि का अत्यधिक असमान वितरण है ।

1 हेक्टेयर से कम जोत भूमि रखने वाले 57.8% सीमांत कृषकों के पास मात्र 13.4% भूमि है । जबकि, 5 हेक्टेयर से अधिक जोत रखने वाले किसान मात्र 2% हैं, परंतु उनके पास कुल भूमि का 20% भाग है । वर्तमान समय में इसीलिए भूमि-सुधार को गरीबी निवारण व 20 सूत्रीय कार्यक्रम का अंग बना लिया गया है ।

1994 ई. में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया कि जिन भूमिहीन व सीमांत किसानों को भूमि प्रदान किया जाए, उन्हें प्रति हेक्टेयर 2,500 रुपये भी प्रदान किए जाएँ ताकि वे कृषि भूमि का विकास कर सकें ।

चकबंदी भी मुख्यतः उन्हीं क्षेत्रों में संभव है, जहाँ पर संरचनात्मक सुविधाएँ उपलब्ध रहती है । इसीलिए चकबंदी का कुल 80% क्रियान्वयन हरित क्रांति प्रदेशों में ही हो पाया है । अन्य प्रदेशों में चकबंदी ठीक तरीके से लागू नहीं हो पाई ।

उदाहरण के लिए बिहार को लिया जा सकता है क्योंकि यहाँ बाढ़, सूखा, भूमि की उर्वरता में विषमता आदि समस्याएँ थी । वस्तुतः संरचनात्मक कारकों के विकास के बिना चकबंदी लगभग असंभव है ।

काश्तकारी सुधार के अंतर्गत कार्य भी बहुत कम राज्यों में हो सके हैं । केवल पश्चिम बंगाल में इसके लिए कानून बनाया गया है, जहाँ काश्तकारों को जोत अधिकार तब तक दिया गया है, जब तक कि भू-स्वामी स्वयं खेती न करने लगे । इस कानून में कुल उत्पादन का 10 भाग काश्तकार को एवं 6 भाग भू-स्वामी को मिलने का प्रावधान है ।

भूमिहीनों व काश्तकारी सुधार की समस्या इस कारण भी बनी हुई है क्योंकि जो खेती नहीं करते हैं या जिन्होंने अन्य वैकल्पिक व्यवसाय अपना लिया है, वे भी भूमि पर अपने अधिकार को कमजोर नहीं करना चाहते ।


Essay # 6. वृहद खाद्य पार्क (मेगा फूड पार्क) (Mega Food Parks):

देश में खाद्य अपव्यय को कम करने व मूल्यवर्द्धन को बढ़ावा देने के लिए 17 नए मेगा फूड पार्कों (Mega Food Parks) की स्थापना के प्रस्तावों को केन्द्र सरकार ने मंजूरी प्रदान की है ।

इनमें से 2-2 मेगा फूड पार्क केरल, तेलंगाना, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र व तमिलनाडु में स्थापित किए जायेंगे । जबकि 1-1 मेगा फूड पार्क मध्य प्रदेश, बिहार, गुजरात, ओडिशा व आंध्र प्रदेश में स्थापित किया जाएगा ।

नए स्वीकृत 17 मेगा फूड पार्कों में से 6 का विकास इन राज्यों की सरकारी एजेंसियों द्वारा व शेष 11 का विकास निजी क्षेत्र की एजेंसियों द्वारा किया जाएगा । इन मेगा फूड पार्कों के पूरा होने पर सम्बंधित राज्यों में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के विकास को बढ़ावा मिलेगा तथा किसानों को उनकी उपज का पूरा मूल्य मिलने में मदद मिलेगी ।


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